शनिवार, 24 मार्च 2012

'कोई मुझे बचा ले'


वरुण शैलेश

हाल में पंजाब के मनसा जिले में एक पुलिसकर्मी व्दारा एक लड़की को निर्मता से पीटने का मामला सामने आया है। इस घटना को मीडिया में शर्मनाक बताया गया। बेशक यह घटना शर्मसार और पुलिसिया रवैये को उजागर करने वाली है। मगर एक सवाल हमेशा उठता है कि इस देश को शर्म केवल किसी संभ्रांत महिला के प्रति हुए उत्पीड़न पर आती है। क्या यह शर्म किसी आदिवासी महिला को थाने में बैठाकर उसके गुप्तांगों में पत्थर भरने से नहीं आती है। यह बेहद अफसोसजनक है जिस पुलिस अफसर के इशारे पर इस कुकृत्य को अंजाम दिया गया उसे भारत सरकार ने मेडल से सम्मानित किया। इससे सरकार की आदिवासी महिलाओं की अस्मिता और मानवीय सम्मान को लेकर कितनी गैरजिम्मेदार है। सम्मान देने पर महिला संगठनों का दिल्ली में प्रदर्शन भी हो चुके हैं। सोनी सोड़ी छत्तीसगढ़ में शिक्षिका हैं और उन्हें नक्सलियों का मददगार बताकर जेल में रखा गया है।कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि सोनी सोड़ी के निजी अंगों में पत्थर डाले गए थे। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जा चुकी है। लेकिन न्यायपालिका भी चुप है। सोनी सोड़ी की चिट्ठी एक असहाय स्त्री के तकलीफ को बयां करने के लिए काफी है। लेकिन ऐसी स्थिति में न्याय की किससे उम्मीद की जाए। सोड़ी लगातार अपने पत्रों से पुलिस उत्पीड़न के बारे में बता रही हैं। मगर उनकी मदद को कोई सामने नहीं आ रहा है। संसद में आदिवासी प्रतिनिधियों की तादाद भी अच्छी-खासी है, लेकिन अभी तक वे सोनी सोड़ी को लेकर उदासीन ही दिख रहे हैं। ऐसे में आदिवासी संगठनों की सक्रियता और उनके औचित्य पर भी सवाल खड़े होते हैं। हालांकि देशभऱ में आदिवासी तमाम मोर्चों पर लड़ रहे हैं।

पुलिस के बर्ताव को हम यहां तो बताने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन फिर भी उनकी कुछ लाइनों को सामने रख रहे हैं।1. मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है। 2. जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी। 3. पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि तुम रंडी औरत हो, इस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।

पुलिस का रवैया पूरे मामले में देश छोड़कर जा चुके अंग्रेजों के सामान है शायद उससे भी कहीं ज्यादा निर्मम। ऐसा लग रहा है जैसे इस मामले में वह अंग्रेजों की क्रूरता से आगे निकलने की चेष्टा में है। बचपन में कहानियां सुनते थे कि अंग्रेज सिपाहियों से अपनी इज्जत बचाने के लिए सैकड़ों महिलाओं ने कुएं में कूदकर जान दी अथवा आग में जलकर अपनी अस्मिता बचाई थीं। मगर आज घर के अंग्रेजों से भारतीय महिला कैसे अपनी इज्जत बचाए। क्या आज भी हम यह कहने की स्थिति में हैं कि अंग्रेज इस देश को छोड़कर जा चुके हैं और हम उनकी प्रताड़ना से आजाद हैं।

असल में, भारतीय समाज का एक बड़ा ढांचा कमजोर, गरीब, दलित और आदिवासी समुदाय को मानवेतर आंकता है। इसी ढांचे से नौकरशाही का तानाबाना भी बना है, जो खुद को शोषक के बतौर पेश करने में गौरवान्वित महसूस करता है। देश के शर्म का सवाल कब खड़ा होता है ? ऐसी घटना किसी सभ्रांत घर की महिला के साथ होता तो संभवत: शर्म का सवाल बनता। मगर सोनी सोड़ी की पीड़ा तमाम उन सामान्य घटनाओं जैसी लगती है जिनकी अमूमन नियति मानकर अनदेखी कर दी जाती है। नियति का खाका पीड़ित समुदाय के असहाय होने से तैयार होता है। उसके पास इन तमाम साजिशों से निपटने के लिए सचेत और मजबूत शख्सियतों का अभाव है। लोकतंत्र का विज्ञापन करने वाली सत्ता आदिवासी नेतृत्व या शख्सियत के खड़े होने में भी अड़ंगे डालती नजर आती है। इसका उदाहरण सोनी सोड़ी के भतीजे पत्रकार लिंगाराम कोडोपी को जेल में डालना है। क्या कोई गैर आदिवासी पत्रकार कोडोपी से बेहतर उनकी समस्याओं को उठा सकता है। कोडोपी को नक्सली मददगार बताकर उसे जेल में डालना आदिवासी समाज की आवाज कुंद करने की कोशिश को दर्शाता है।