रविवार, 4 मई 2014

लोकतंत्र के रास्ते में बाधा डाल रहे हैं दबंग


कीर्ति अनामिका
संसदीय राजनीति में चुनाव, लोकतंत्र की प्रक्रिया में जनता की भादीदारी का एक मात्र मौका मुहैया कराता है। इसके जरिये मतदाता को अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को प्राप्त करने और सामाजिक तथा आर्थिक आजादी को कायम रखने वाले प्रतिनिधि को चुनने का अधिकार होता है। लोकतंत्र की नींव मजबूत करने और चुनाव में मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के मकसद से निर्वाचन आयोग ने लोकसभा चुनाव-2014 में भारी पैमाने पर मुहिम चलाई। आयोग का यह अभियान काफी हद तक सफल भी रहा। आजादी और सुरक्षा को लेकर देश के दलित समाज के लिए चुनाव अहम पड़ाव होता है। इसलिए वंचित समाज का चुनाव में अपनी सुरक्षा और तरक्की का रास्ता मुहैया कराने वाले दलों के प्रति झुकाव बढ़ा है तथा वे बड़े उत्साह से मतदान प्रक्रिया में वोट डालने के लिए उत्सुक होते हैं। लेकिन दलितों का यही उत्साह वर्चस्वशाली समाज को खटकता है। अपने ढांचा और रूढ़िवादी प्रतिमान के चलते ताकतवर समाज दलितों को वोट डालने से रोकने के लिए तमाम साजिशें रचता है।
चुनाव प्रक्रिया संख्याओं का खेल है। जिसके पाले में जितना वोट होगा वह समाज उतना ही सशक्त होगा। संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर लिखते हैं कि भारत में किसी समय जनगणना एक सरल और सहज प्रक्रिया हुआ करती थी। जिसमें केवल जनसंख्याविदों को ही रूचि रहती थी। बाकी किसी कोई इसमें दिलचस्पी नहीं होती थी। आज जनगणना पर सभी का अत्यधिक ध्यान जा रहा है। सिर्फ राजनीतिज्ञ को ही नहीं, बल्कि जनसामान्य को भी इसकी चिंता रहती है। इसका कारण ये है कि भारत की राजनीति आज संख्या का खेल बन गई है। संख्या ही वह तत्व है जो एक समुदाय को दूसरे से अधिक राजनैतिक महत्व देती है। ऐसा दुनिया के किसी देश में नहीं होता है। इसका परिणाम है कि जनगणना में इस प्रकार की गड़बड़ी की जाती है, जिससे संख्या के आधार पर राजनीतिक लाभ बटोरा जा सके। जनसंख्या की इसी गड़बड़ी में हिन्दू, मुसलमान और सिखों ने अपनी अपनी भूमिका रसोई घर के मुख्य रसोइये की निभाई है। इसमें अछूत और इसाई भी रुचि ले रहे हैं जिनका जनगणना की कारीगरी में कोई हाथ नहीं है। क्योंकि देश के प्रशासन में उनका कोई स्थान नहीं है जो जनगणना का काम देखता है बल्कि इसके विपरीत हिन्दू, मुसलामन और सिख अछूतों के समूह को जनगणना के आधार पर काटछांट कर अपने साथ गिन रहे हैं। 1940 की जनगणना में खासतौर पर ऐसा हुआ। पंजाब के कुछ विशेष भागों में सिखों ने अछूतों को योजनाबद्ध तरीके से धमाकाया और सताया। उनका इरादा था कि अछूतों को विवश किया जाए कि वे सिख न होते हुए भी जनगणना में अपने को सिख लिखवाएं। इससे अछूतों की संख्या सिकुड़ गई और सिखों की बढ़ गई। हिन्दुओं ने एक अलग से अभियान चलाया कि जनगणना में कोई अपनी जाति न लिखवाए। अछूतों से अपील की गई। उन्हें बताया गया कि जाति का नाम ही यह प्रकट करता है कि वे अछूत हैं। वे अपनी जाति का उल्लेख न करके केवल यही लिखाए की वे हिन्दू हैं तो उनके साथ अन्य हिन्दुओं की तरह बर्ताव किया जाएगा और किसकी को यह पता भी नहीं चलेगा कि वे अछूत हैं। अछूत इस झांसे में आ गए औऱ उन्होंने तय किया कि वे जनगणना में खुद को अछूत न लिखवाएंगे। केवल हिन्दू बताएंगे। नतीजा साफ था कि अछूतों की संख्या घट गई और हिन्दुओं की बढ़ गई।
अब दलित समाज अपनी ताकत को लेकर जागरूक हो चुका है और बड़े पैमाने पर वोट कर रहा है। इससे समाज का सामंतवादी तत्व घबरा गया है औऱ वह हिंसा पर उतारु हो गया जिसके लिए समाज में कोई जगह नहीं है। 17 अप्रैल को बरेली जिले के देवचरा नई बस्ती निवासी हरि सिंह को आम चुनाव में मतदान करने से रोका गया जिसके चलते उन्होंने आत्मदाह कर लिया। हरि सिंह दलित थे और उस दिन उन्हें मतदान केंद्र पर अपमानित किया गया। पत्रकार संगठन जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी ने अपनी जांच में पाया कि मतदान केंद्र पर प्रशासन द्वारा जानबूझ कर दलित समुदाय के लोगों को वोट देने से रोकने के लिए एक साजिश के तहत उनके इलाके में मतदाता पर्ची नहीं बांटी गई। ताकि किसी खास प्रत्याशी को चुनाव में लाभ पहुंचाया जा सके। संगठन ने इस मामले की न्यायिक जांच की मांग की है।
इसी तरह झांसी उत्तर प्रदेश में झांसी-ललितपुर लोकसभा क्षेत्र के बजाना गांव में 80 साल के बुजुर्ग की हत्या केवल इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने दबंगों को यह नहीं बताया कि वोट किसे दिया है। 30 अप्रैल को दबंगों के वार से घायल जंगी लाल ने 1 मई की देर रात दम तोड़ दिया। उनसे दंबग जानना चाह रहे थे कि उन्हों ने वोट किसे दिया था। उन्हें  मंदिर ले जा कर भगवान की मूर्ति छू कर जवाब देने के लिए कहा गया। जवाब नहीं मिलने पर उन पर हमला किया गया था। मृतक के बेटे रमेश का कहना है कि पहले से ही उनपर एक पार्टी विशेष को वोट देने के लिए दबाव डाला जा रहा था। बाजना में अधिकतर दलित रहते हैं। उसने बताया कि उन पर दबाव बनाया जा रहा था, जो लोग उनकी बात नहीं मान रहे थे, उन्हें बूथ तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। 

एक तरफ सरकार सबको वोट देने के लिए प्रोत्साहित करने के नाम पर लोगों से जहां जरूर मतदान करने की अपील करती है। वहीं बूथ लेवल अफसर दलित समुदाय के लोगों को किसी भी तरह वोट नहीं डालने देने के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं। यह एक जातिवादी और गैर लोकतांत्रिक मानसिकता है,  जो लोकतंत्र को कमजोर करती है। 16वीं लोकसभा के चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग न कर पाने की वजह से हरि सिंह का आत्मदाह करना यह साबित करता है कि चुनाव आयोग सिर्फ अमीर और मध्यवर्गीय तबकों के लिए ही चुनाव बूथ तक पहुंचने का रास्ता सुगम बनाने के लिए अरबों रुपये प्रचार में फूंक रहा है और उसके अधीन काम करने वाले कर्मचारी दलित बस्तियों में मतदात पत्र बनाने के लिए पैसों की उगाही कर रहे हैं। संसदीय राजनीति में चुनाव प्रक्रिया को लोकतांत्रिक तत्वों को स्थापित करने की दलील दी जाती है लेकिन वर्स्वशाली समाज की ये करतूतें लोकतंत्र को कमजोर बना रही हैं। निर्वाचन आय़ोग को यह सब रोकने के लिए उपाय करने होंगे वरना लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा।

* लेखिका इतिहास की शोधार्थी हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें