गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

संरक्षण के दायरे से बाहर आदिवासी


                                                                  वरुण शैलेश

देश के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। सत्याग्रह जैसे अहिंसक आंदोलन को लोकप्रिय बनाने वाले महात्मा गांधी के रास्ते पर चलकर भी वह अपनी जमीन बचा पाने में नाकाम है। ध्यान देना होगा कि संसदीय लोकतंत्र में सरकार देशवासियों के अधिकारों की रक्षक होती है। लेकिन सरकार ही अधिकारों की अनदेखी करे या खुद ही शोषणकर्ता की भूमिका में आ जाए, तो नागरिक के लिए सरकार जैसी संस्था पर भरोसा कैसे कायम रह सकता है। भारतीय गणतंत्र में सरकार के सामने इस विश्वास को कायम करने की चुनौती होनी चाहिए, मगर तस्वीर इसके विपरीत बनती दिखाई दे रही है।
देशभर में आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने की नीति को इस बानगी के तौर पर देखा जा सकता है। मध्य प्रदेश में होने वाले सत्याग्रहों की कड़ी में अब पट्टा सत्याग्रह भी जुड़ गया है। यह सत्याग्रह खेती के लिए जमीन का पट्टा हासिल करने के लिए समाज के सबसे कमजोर हिस्से के बैगा आदिवासी कर रहे हैं। डेढ़ साल बीत चुका है, लेकिन सत्याग्रही आदिवासियों को अब तक राज्य सरकार से सिर्फ निराशा ही मिली है। गौर करें तो बैगा, देश के आदिवासियों में सबसे पुरानी जनजाति में से एक है। जनजाति के अस्तित्व को खतरे में जानकर केंद्र सरकार ने इनकी सुरक्षा के लिए अनेक योजनाएं चलाई हैं। इसी के तहत बैंगा जनजाति के लोगों को राष्ट्रीय मानव घोषित किया गया है।
ऐसी घोषणाएं व संरक्षण अभियान खोखले नहीं हैं तो और क्या हैं?   कारण साफ है कि मध्य प्रदेश के मंडला जिले में रहने वाले इन आदिवासियों को वन भूमि पर खेती करने की इजाजत नहीं मिल रही है। बताते चलें कि बैगा आदिवासी वन भूमि पर अलग तरह से खेती करते हैं। वे जमीन को जोतने के लिए हल इत्यादि का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि वे धरती को मां मानते हैं और उनकी नजर में हल चलाना मां के सीने पर चाकू चलाने जैसा है। लिहाजा, हर वर्ष उनकी खेती का क्षेत्र बदलता रहता है। मंडला में वन विभाग ने आदिवासियों के लिए जंगल में खेती करने पर रोक लगा दी। इसके चलते ये परिवार अपनी परंपरागत खेती से वंचित हो गए हैं। वन विभाग की इस कार्रवाई के विरोध में और भूमि अधिकार की मांग को लेकर मथना गांव के लगभग 40 परिवारों के 140 लोग अगस्त 2012 से ही पट्टा सत्याग्रह कर रहे हैं। सत्याग्रह में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं। पट्टा सत्याग्रह में शामिल सुशीला बाई का कहना है कि प्रशासन ने न केवल उन्हें वन भूमि पर खेती करने से रोका,  बल्कि उनकी खड़ी फसल को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। उनका आरोप है कि वन विभाग ने  कुछ रसूखदार लोगों के इशारे पर जानवरों के जरिए उनकी फसल नष्ट कराई है। सत्याग्रह कर रहे परिवार दिन में एक बार भोजन करते हैं और न्याय हासिल करने जंगल की उसी जमीन पर रातें बिता रहे हैं, जहां पर उनकी उगी हुई फसल को नष्ट किया गया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्होंने प्रशासन से जमीन का पट्टा मांगा है, ताकि वे खेती कर अपना भरण-पोषण कर सकें, लेकिन उनकी नहीं सुनी जा रही है। बैगा जनजाति के मुखिया कारेलाल का कहना है कि ग्रामसभा ने उन्हें पट्टा देने का प्रस्ताव पारित किया है। इसके बावजूद उनकी मांग अनसुनी की जा रही है। वे अपनी मांग से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी अवगत करा चुके हैं, मगर इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ है। कारेलाल का आरोप है कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद भी उन्हें पट्टा नहीं दिया जा रहा है और उन्हें घरों से बाहर कर दिया गया है। इस स्थिति में उनका जीवन ही संकट में पड़ गया है। ऐसी स्थिति में उनके लिए सत्याग्रह करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। जब तक न्याय नहीं मिलेगा तब तक उनका सत्याग्रह जारी रहेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि बैगा आदिवासी जंगल में रहते हैं और उनका समाज के अन्य वर्गों के साथ कोई सीधा जुड़ाव नहीं है। लिहाजा उनकी आवाज में साथ आने के लिए कोई तैयार नहीं है। सत्याग्रह कर रही राधा बाई कहती हैं कि वे जंगल से बाहर नहीं जाएंगी, भले ही मर जाएं। मंडला के जिलाधिकारी लोकेश जाटव का कहना है कि प्रशासन ने बैगा जनजाति को सामुदायिक भूमि अधिकार दे दिया है, इसमें उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। जिला प्रशासन के फैसले को सत्याग्रही परिवार नाकाफी मान रहे हैं। हालांकि पट्टा सत्याग्रह करने वाले आदिवासी जिस साहस का परिचय दे रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि वे संघर्ष का मन बना चुके हैं। यदि सत्याग्रह आंदोलन लंबा चला तो राज्य में हक की लड़ाई के लिए अब तक हुए सभी सत्याग्रहों जैसे- जल सत्याग्रह, चिता सत्याग्रह राज्य सरकार को नई चुनौती पेश कर सकता है।
सुनिया बाई मध्य प्रदेश में कटनी जिले के बुजबुजा और डोकरिया गांव के किसानों के लिए चिता सत्याग्रह कर रही थीं। मध्य प्रदेश सरकार से 24 नवंबर, 2009 को हुए समझौते के आधार पर वेलस्पन नाम की कंपनी को इन गांवों में 1980 मेगावाट क्षमता की ग्रीनफील्ड ताप विद्युत परियोजना लगाने की मंजूरी दी गई थी। सरकार दो हजार एकड़ जमीन देने के लिए राजी थी, जिसमें 1400 एकड़ जमीन का बंदोबस्त हो पाया है। इसमें 800 एकड़ सरकारी जमीन शामिल है। बाकी 600 एकड़ जमीन किसानों से अधिग्रहित की जा रही है। किसान इसी का विरोध कर रहे हैं। जमीन अधिग्रहण का विरोध करने की वजह से सुनिया बाई प्रशासन के निशानें पर आ गई और प्रशासन के उत्पीड़न से तंग आकर उन्होंने खुदकुशी कर ली।
सुनिया बाई की खुदकुशी बताती है कि इस लोकतांत्रिक देश में नागरिक को सर्वोच्च बताने का नारा कोरा है। यह उस प्रचारकों के मुंह पर तमाचा है, जो भारत को दुनिया का सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रचारित करते हैं।
अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी रहे डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा अपनी नियुक्ति के दौरान आदिवासियों की तमाम समस्याओं को जाना। डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने इन्हीं अनुभवों को टूटे वायदों का अटूटा इतिहास के नाम से किताबों की शक्ल दी। यह किताब आजादी के बाद आदिवासियों के सवालों को सामने रखती है। वे लिखते हैं कि आदिवासी इलाकों में विकास के संदर्भ में छोटी-छोटी बातों पर व्यापक दृष्टिकोण व समझ जरूरी है, ताकि प्रत्येक समुदाय की विशिष्ट जरूरतों व समस्याओं को ध्यान रखते हुए विकास कार्यों को लागू किए जा सके। विविधता को खारिज कर सबके लिए एक समान नजरिया ठीक नहीं होगा। आदिवासी समाज किसी विशिष्ट क्षेत्र या रहवास से भावनात्मक तौर पर जुड़ा होता है। यह सोच राज्य की सार्वभौम सत्ता की मान्यता के ठीक विपरीत है। आदिवासी सोच में जमीन संपत्ति नहीं है। उसका प्रबंधन आमतौर पर सामूहिक स्वामित्व और व्यक्तिगत उपयोग की पारम्परिक मान्यता के आधार पर होता है। देश की कानून व्यवस्था से उसे निकाल देने और सामान्य कानूनों को जैसा का तैसा लाद देने की व्यवस्था से आदिवासी समाज कमजोर बना दिया गया है। शासन के स्तर पर जिस बाजारवादी व्यवस्था को तरजीह दी जा रही है, उसमें सीधा सच्चा आदिवासी पूरी तरह संरक्षणविहिन हो गया है। 

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