शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

इन बेबस जानवरों की बलि क्यों?


                                                                                                                                                                                                   योगेंद्र सिंह


छत्तीसगढ़ में राजनंद जिले के छुरिया इलाके में गांव वालों ने जंगल के अफसर की मौजूदगी में एक बाघिन को बड़ी बेरहमी से पत्थर मार - मार कर मौत के घाट उतार दिया। गांव वालों ने ये सब अंधविश्वास के चलते किया। ग्रामीणों का मानना है कि मन में किसी कार्य की इच्छा रखकर किसी जानवर की  पत्थर मार - मार कर बलि देने से मन की इच्छानुसार कार्य पूर्ण होता है। इस प्रकार के और भी कई अंधविश्वासी नज़ारे हमें जगह- जगह देखने को मिल जायेंगे।

हमारे देश में सुकमा, कांकेर, तुमगांव, दंतेवाड़ा, बलौदाबाज़ार, बिलासपुर, नारायणपुर, गरियाबंद, धमतरी, सरईपाली वगैरह कई ऐसे इलाके है, जहाँ अंधविश्वास के नाम पर अत्यधिक लोगो को ठगा जाता है। भूत भगाने या टोनही से छुटकारा पाने के लिए मुर्गा, बकरी, जंगली बिल्ली, सियार जैसे कई जानवरों की बालि दी जाती है। बाघ के खाल, उसके बाल, नाखून, तेंदुएं के दांत वगैरह जिसके पास रहते है, उसके पास भूत, जिन्न भटकते नहीं है। ऐसा अधिकतर लोगों का मानना है। इस अंधविश्वास के कारण न जाने कितने बाघों कि हत्या होती  है और न जाने कितने तेंदुओं को मार गिराया जाता है।
अंधविश्वास फ़ैलाने वाली ज्योतिष की जानकार डॉ. सुनीता द्विवेदी कहती हैं कि तंत्र- मंत्र की साधना के लिए अमावस्य की रात सबसे अच्छा समय होता है। तंत्र साधना में पशु- पक्षियों की बलि अति आवश्यक होती है, क्योकि तंत्र साधना बलि के बगैर अधूरी मानी जाती है। शेर, बाघ, भालू तो आसानी से मिलते नहीं, लेकिन उल्लू आसानी से मिल जाते हैं। वैसे भी तंत्र साधन में उल्लू को विशेष अहमियत दी गई है। तंत्र क्रिया के दौरान उल्लू को मारने के बाद उसका हर अंग अत्यंत कीमती व फलदायी होता है। उल्लू के नाखून ताबीज बनाने के काम आते है। उल्लू कि आँखें विभिन्न बीमारियों की दवा बनाने में प्रयोग होती है और उल्लू के बाल को तिजोरी में रखने से वह कभी खाली नहीं होती है। ऐसे और भी कई अन्य विचार लोगों में चर्चित है।
छत्तीसगढ़ वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य प्राण चड्ढा कहते हैं कि राज्य में बाघों के सरकारी आंकड़े सही नहीं हैं। पिछली बार की अपेक्षा राज्य में 22 से 28 बाघ हैं। लेकिन इस रिपोर्ट पर शक है, क्योंकि इसमें बारनवारा सेंचुरी में 8 बाघों के मौजूद होने के दावे किए गए हैं  जबकि वहाँ मुश्किल से 2 या 3  बाघों के होने की  बात सामने आ रही है। चौकाने वाली बात तो यह है कि पिछले चार वर्षों में टाइगर प्रोजेक्ट के तहत केंद्र सरकार ने तकरीबन 32 करोड़ रुपये दिए हैं, जबकि राज्य का 30 करोड़ का बजट था। इसके बावजूद भी राज्य में बाघों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया है।

मध्य प्रदेश के बाघों की  हालत बहुत अच्छी नहीं है। पन्ना टाइगर रिजर्व के निदेशक श्रीनिवास मूर्ति ने राज्य सरकार के जंगल महकमे को एक रिपोर्ट भेजी, जिसमे उन्होंने बताया था कि वर्ष 1990 से वर्ष 2011 तक तकरीबन 19 बाघों का शिकार किया जा चूका है। वही मुख्य वन  संरक्षक डॉ. एच. एस. पाबला कि रिपोर्ट श्रीनिवास मूर्ति की रिपोर्ट से अलग है। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, पन्ना टाइगर रिजर्व में नर बाघों कि तादाद ज्यादा थी, जिससे दबदबे कि लड़ाई के चलते बाघ आपस में लड़कर  घायल हो गए और उनकी मौत हो गई। पन्ना के लोगों का कहना है कि टाइगर रिजर्व से अब तक 36 बाघ गायब हो चुके है। जहां सरकार एक तरफ वन्य जीव व जानवरों के लिए तरह- तरह के प्रयास कर रही है, लेकिन अंधविश्वास के चलते जानवरो की जो हत्या हो रही है। इसकी रोकथाम के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है। जानवरों को बचाने के लिए जरूरी है कि उसकी दहाड़ के दुश्मन बने अंधविश्वास पर रोक लगाने की  दिशा में ठोस कदम उठाये जाएं। केवल एक- दूसरे पर आरोप लगाकर जवाबदेही की नीति न अपनाए। आदिवासी व आस-पास के गांव में जंगली जानवरों को मारने की जो परम्परा है, उसमें जागरूकता लाई जाए।  नहीं तो ढुलमुल रवैये के चलते एक दिन बाघ के साथ- साथ और भी कई पशु- पक्षी व जानवर देखने को नहीं मिलेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें