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गुरुवार, 28 जून 2012

" उस लड़के का नाम रमेश था "

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आप इस आभामंडल में खोए रहते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं। मगर खुद को कल्याणकारी राज्य  के तौर विज्ञापित करने वाले भारत का स्याह चेहरा भी देखा जाना चाहिए। दंतेवाणा के आदिवासी युवक रमेश की कहानी हिमांशु कुमार के फेसबुक पेज से लिया गया है, जिसमें निर्मतता के साथ आम आदमी के साथ किया जाने वाला राज्य का अत्याचार साफ  झलकता है। इसे आपसे साझा कर रहे हैं। 




     कल रात कुछ पुरानी फाईलें पलट रहा था! मेरे हाथ में एक फाइल आयी और मेरी आँखों के सामने सारी घटनाएं फिर से घूमने लगी ! ये उसी समय की बात है जब 2009 मे लिंगा कोड़ोपी नाम के आदिवासी युवक को पुलिस ने जबरन पकड़ कर गैर कानूनी तौर पर कैद किया हुआ था और छत्तीसगढ़ पुलिस उसे थाने में एस पी ओ बनने के लिए लगातार यातनाये दे रही थी ! लिंगा कोडोपी को तो बाद में अदालत के मार्फ़त छुड़ा लिया गया लेकिन पुलिस ने एक और आदिवासी युवक की ज़िंदगी लगभग तबाह कर दी ! ये फाइल उसी युवक की थी ! 
    उस लड़के का नाम रमेश था ! एक आम आदिवासी युवक ! दंतेवाडा के पास एक गांव में पूरा परिवार रहता था ! पिता एक सरकारी शिक्षक ! माँ गाँव की सरपंच! रमेश ने बीए पास किया, किस्मत ने साथ दिया और पिता ने जीवन की कमाई बेटे के भविष्य के लिए लगा दी ! रमेश को सरकारी कंपनी एन एम् डी सी में नौकरी मिल गयी! पूरे गाँव में वो सबका दुलारा हमेशा सब से सर झुका कर बात करने वाला सीधा सादा युवक था ! कुछ समय बीतने पर परिवार ने रमेश का विवाह एक पढ़ी लिखी आदिवासी लडकी से करा दिया ! कुछ समय बाद रमेश ने एक मोटर साईकिल भी खरीद ली !
यहीं से रमेश की ज़िंदगी की बर्बादी का सिलसिला शुरू हो गया ! ये उस समय की बात है जब दंतेवाडा में डी आई जी कल्लूरी और एस पी अमरेश मिश्रा थे ! सरकार आदिवासियों के गावों को खाली कराने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही थी ! हर गावों के पढ़े लिखे आदिवासी युवक को जबरन सरकार और पुलिस का मुखबिर बना कर गावों में ज़मीन छीनने का विरोध करने वालों के बारे में जानकारी ली जाती थी! बाद में उन सभावित विस्थापन विरोधी आदिवासी नेताओं को नक्सली कह कर जेलों में डाल दिया जाता था ! आज भी छत्तीसगढ़ की जेलें ऐसे ही निर्दोष आदिवासियों से भरी पडी हैं और सरकार आदिवासियों की ज़मीनों को विदेशी कंपनियों को बेच रहा है! 
      रमेश को पुलिस ने उसके घर से उठाया और थाने ले गए ! माता पिता और गांव के कुछ लोग थाने गए ! पूछा की हमारे बेटे ने क्या अपराध किया है ? थानेदार ने कहा अपराध तो मुझे नहीं मालूम हम तो ऊपर के साहब लोगों का हुकुम बजाते हैं! थानेदार ने सलाह दी कि आप लोग डी आई जी साहब से मिल लीजिये वो बोल देंगे तो हम तुरंत छोड़ देंगे ! परिवार वाले एस पी अमरेश मिश्रा और डी आई जी कल्लूरी से मिले वो बोले कुछ दिनों में छोड़ देंगे ! परिवार के लोग मदद मांगने हमारी संस्था में आये ! हमने वकील से बात की ! एक पत्र बनाया और एस पी अमरेश मिश्रा और डी आई जी कल्लूरी समेत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजा गया ! कहीं से कई सहायता मिलना तो दूर जवाब भी नहीं आया ! लेकिन एस पी अमरेश मिश्रा और डी आई जी कल्लूरी सतर्क हो गए और उन्होंने आनन् फानन में एक पत्रकार सम्मलेन बुलाया और कहा की कल पुलिस ने जंगल में नक्सलियों के साथ एक वीरतापूर्ण मुकाबले में एक नक्सली कमांडर को गिरफ्तार करने में सफलता पायी है जिसका नाम रमेश है ! और उसके बाद पुलिस ने रमेश को पत्रकारों के सामने पेश कर दिया और जेल में डाल दिया ! इसके कुछ समय के बाद मुझे भी दंतेवाडा छोड़ना पड़ा! 
   कल रमेश की फ़ाइल पढने के बाद मैंने लिंगा कोडोपी से पूछा की अब रमेश की क्या खबर है? उसने बताया की पुलिस ने उसे आपके दिल्ली आने के बाद छ महीने होने पर छोड़ दिया ! इस बीच उसकी पत्नी ने सदमे से आत्महत्या कर ली ! जेल जाने के कारण रमेश की नौकरी भी चली गयी ! परिवार के पास जो ज़मीन थी वो वकीलों की फीस चुकाने में बिक गयी! पूरा परिवार बर्बाद हो गया ! रमेश अब ज्यादातर घर में अन्दर पड़ा रहता है ! किसी से बात नहीं करता ! परिवार वाले भी इस सदमे से अभी तक उबर नहीं पाए हैं ! डर लगा रहता है की कहीं पुलिस फिर से ना पकड़ कर ले जाए ! मेरा दिल किया में जोर से चिल्लाऊं ! पर कौन सुनेगा?

सोमवार, 11 जून 2012

न्याय की बैसाखी पर मौत की इबारत



अंजनी कुमार
8 जून 2012... सेशन कोर्ट, इलाहाबाद। सुबह 11बजे से न्याय के इंतज़ार में हम लोग खड़े थे। सीमा आज़ाद और विश्वविजय कोर्ट में हाजि़र नहीं थे। वकील ने बताया कि जज साहब दोपहर बाद ही बैठेंगे, वह अभी भी 'न्याय' को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं। हम लोगों के लिए इस व्यस्तता को जान पाना व देख पाना संभव नहीं था। कमरा न. 23 के आसपास गहमागहमी बनी हुई थी। तेज धूप और उमस में छाया की तलाश में हम आसपास टहल रहे थे, बैठ रहे थे और बीच-बीच में कोर्ट रूम में झांक आ रहे थे कि जज साहब बैठे या नहीं। सीमा की मां, बहन, भाई, भांजा व भांजी और कई रिश्तेदार व पड़ोसी इस बोझिल इंतज़ार को एक उम्मीद के सहारे गुज़ारने में लगे थे। मैंने अपने दोस्त विश्वविजय के चचेरे भाई और वकील के साथ बातचीत और इलाहाबाद विश्वविद्यालय को देख आने में गुज़ार दिया। 

विश्‍वविजय और सीमा आज़ाद


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस लॉन में जहां हम लोगों ने पहला स्टडी सर्किल शुरू किया था, वहां बैठना मानो एक शुरूआत करने जैसा था। 1993 में बीए की पढ़ाई करते हुए विकल्प छात्र मंच और बाद में इंकलाबी छात्र सभा को बनाने का सफ़र यहीं से हमने शुरू किया था। विश्वविजय रिश्ते में भवदीय था लेकिन छात्र जीवन और राजनीति में हमसफ़र। हम आपस में बहुत लड़ते थे। इस लड़ने में हम लोगों के कई हमसफ़र थे। हम जितना लड़ते, हमारे स्टडी सर्किल और संगठन का विस्तार और उद्देश्यों की एकजुटता उतनी ही बढ़ती गई। 1996 के अंत में मैं गोरखपुर चला गया। इलाहाबाद से प्रस्थान करने तक विश्वविजय शाकाहारी से मांसाहारी हो चुका था, खासकर मछली बनाने में माहिर हो चुका था। वह एक अच्छा कवि बन चुका था और प्रेम की धुन में वह रंग और कूची से प्रकृति को सादे कागज़ पर उतारने लगा था। उसके बात करने में व्यंग्‍य और विट का पुट तेजी से बढ़ रहा था। 1997 में गांव के और वहां के छात्र जीवन के अध्ययन व इंकलाबी छात्र सभा के सांगठनिक विस्तार के लिए मैं पूर्वांचल के विशाल जनपद देवरिया चला गया। बरहज, लार, सलेमपुर, गौरीबाजार, चौरीचौरा, खुखुन्दु आदि कस्बों व गांवों पर वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की गहरी पकड़ बढ़ती जा रही थी। दो बार लगभग 35 किमी का लंबा दायरा चुनकर रास्ते के गांवों का अध्ययन किया। इसमें न केवल गांव की जातीय व जमीन की संरचना एक हद तक साफ हुई, साथ ही अपने जातीय व वर्गीय पूर्वाग्रह भी खुल कर सामने आए। इस बीच विश्वविजय से मुलाकात कम ही हुई। इंकलाबी छात्र सभा के गोरखपुर सम्मेलन में विश्वविजय से मुलाकात के दौरान वह पहले से कहीं अधिक परिपक्व और मज़बूत लगा। वह छात्र मोर्चे में पड़ रही दरार से चिंतित था। 1999 में मैं बीमार पड़ा। महीने भर के लिए इलाहाबाद आया। उस समय तक इंकलाबी छात्र सभा की इलाहाबाद इकाई में दरार पड़ चुकी थी। आपसी विभाजन के चलते साथियों के बीच का रिश्ता काफी तंग हो चुका था। इन सात सालों में हम सभी दोस्तों के बीच जो बात मुख्य थी वह सामाजिक सरोकारों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना थी और लोगों को पंगु बनाने की नीति के प्रति गहरी नफ़रत थी। सन 2000 में ऑपरेशन के लिए दिल्ली आना पड़ा और फिर यहीं का होकर रह गया। इस बीच विश्वविजय से बहुत कम मुलाकात हुई। दो बार गांव में और दो बार इलाहाबाद। मेरा इंकलाबी छात्र सभा से रिश्ता टूट चुका था। विश्वविजय इस मोर्चे पर डटा रहा। वह इस बीच गांवों के हालात के अध्ययन के लिए इलाहाबाद के आसपास गया। उसने मुलाकात के समय फूलपुर के किसानों और शंकरगढ़ के दलित व आदिवासी लोगों के जीवन के बारे में काफी कुछ बताया। बाद के दिनों में विश्वविजय से सबसे अधिक मुलाकात और बात नैनी जेल में हुई। हम दोनों के बीच लगभग बीस सालों के बातचीत के सिलसिले में परिवार का मुद्दा हालचाल जानने के उद्देश्य से आता था। लेकिन इस8 जून को यह सिलसिला भी टूट गया। 

शाम पांच बजे 'न्याय की इबारत' सुनने के बाद सारी बेचैनी को समेटे हुए कोर्ट से बाहर आने से पहले विश्वविजय से गले मिला और कहा- 'जल्दी ही जेल में मिलने आऊंगा।' वह काफी शांत था। व्यंग्‍य और विट की भाषा कभी न छोड़ने वाला विश्वविजय मेरा हाथ पकड़े हुए भवदीय रिश्ते की भाषा में लौट आया। मानो लगा कि हम 1992 की चौहद्दी पर लौट गए हों- गांव से आए हुए दो नवयुवकों और हम दोनों को गाइड करने, भोजन बनाकर खिलाने वाले मेरे अपने बड़े भाई के सान्निध्‍य में। मेरे बड़े भाई हम दोनों के इलाहाबाद आने के बाद एक साल में ही नौकरी लेकर इलाहाबाद से चले गए। और फिर भाईपने से मुक्त हम दोनों अलग-अलग इकाई थे। और इस तरह हम एक जुदा, स्वतंत्र और एक मक़सद की जि़ंदगी जीते हुए आगे बढ़ते गए। हमारा समापवर्तक जो बन गया था, उससे हमारा परिवार भी चिंतित था। पर, उस कोर्ट में हम 1992 की चौहद्दी पर लौट गए थे। विश्वविजय कोर्ट में जिम्मेदारी दे रहा था- ''अम्मा बाबूजी को संभालना...हां...ख्याल रखना...।' मैं कोर्ट से बाहर आ चुका था।

लौटते समय मेरा दोस्त संयोगवश मुझे उन्हीं गलियों से लेकर गया जहां मेरे गुरु और हम लोगों के प्रोफेसर रहते थे,जहां हमने इतिहास और इतिहास की जि़म्मेदारियों को पढ़ा और समझा था। यहीं मैंने लिखना सीखा, यहीं अनगढ़ कविता को विश्वविजय ने रूप देना सीखा। हम उन्हीं गलियों से गुज़र रहे थे- अल्लापुर लेबर चौराहे से- मज़दूरों और नौकरी का फॉर्म भरते व शाम गुज़ारते हज़ारों युवा छात्रों की विशाल मंडी से। इन रास्तों से गुज़रना खुद से जिरह करने जैसा था। सिर्फ सीमा और विश्वविजय के साथ कोर्ट में न्यायाधीश के द्वारा किए व्यवहार से, उसके 'न्याय' से जूझना नहीं था। हम जो पिछले बीस साल गुज़ार आए हैं,जिसमें हमारे लाखों संगी हैं और लाखों लोग जुड़ते जा रहे हैं, उनकी जि़ंदगी से जिरह करने जैसा।


लगभग छह महीने पहले गौतम नवलखा ने सीमा आज़ाद का एक प्रोफाइल बनाकर भेजने को कहा। मैंने लिखा और भेज दिया। उसे उस मित्र ने कहां छापा, पता नहीं। मैं इस उम्मीद में बना रहा कि आगे विश्वविजय और सीमा का प्रोफाइल लिखने की ज़रूरत नहीं होगी। कई मित्रों ने कहा कि लिखकर भेज दो, पर एक उम्मीद थी सो नहीं लिखा। लिखना जिरह करने जैसा है। इस जिरह की जरूरत लगने लगी है। यह जानना और बताना ज़रूरी लगने लगा है कि सीमा और विश्वविजय के जीवन का मसला सिर्फ मानवाधिकार और उसके संगठन से जुड़कर चलना नहीं रहा है। सीमा एक पत्रिका की संपादक थी और उससे सैकड़ों लोग जुड़े हुए थे। विश्वविजय छात्र व जनवाद के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहा। और कम से कम इलाहाबाद के लोगों के लिए कोई छुपी और रहस्यपूर्ण, षडयंत्रकारी बात नहीं थी यह। यह एक ऐसा खुला मामला था जिसे सारे लोग जानते थे और कार्यक्रमों के हिस्सेदार थे। सीमा आज़ाद का यह प्रोफाइल अपने दोस्तों के लिए एक रिमाइंडर की तरह है: 

6 फरवरी 2010 की सुबह इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर रीवांचल टेªन से उतरते ही सीमा व उनके पति विश्वविजय को माओवादी होने व राज्य के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। दोनों के ऊपर यूएपीए- 2005 के तहत मुकदमा ठोक दिया गया। इसके बाद कोर्ट में एक के बाद एक ज़मानत की अर्जी पेश की गई, पर हर बार यह अर्जी खारिज कर दी गई। ज़ाहिरा तौर पर ज़मानत न देने के पीछे सीमा आज़ाद के खतरनाक होने का तमगा ही राज्य के सामने अधिक चमक रहा होगा। आज जब लोकतंत्र पूंजी, कब्ज़े व लूट की चेरी बन जाने के लिए आतुर है, तब खतरनाक होने के अर्थ भी बदलता गया है। मसलन, अपने प्रधानमंत्री महोदय को युवाओं का रेडिकलाइजेशन डराता है। इसके लिए राज्य मशीनरियों को सतर्क रहने के लिए वे हिदायत देते हैं। सीमा आज़ाद उस दौर में रेडिकल बनीं जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं हुआ करते थे। तब उन्होंने विश्व बैंक के तहखानों से निकल कर इस देश के वित्त मंत्री का पद संभाला था। साम्राज्यवादियों के इशारे पर उन्होंने खुद की बांह मरोड़ लेने की बात कही थी। इसके बाद तो पूरे देश के शरीर को ही मरोड़ने का सिलसिला चल उठा। उस समय सीमा आज़ाद का नाम सीमा श्रीवास्तव हुआ करता था। उसने इलाहाबाद से बीए की पढ़ाई की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एमए किया। 1995 तक ब्रह्मांड की गतिविधियों में ही उसकी ज्यादा रुचि बनी रही। बृहस्पति के चांद जो लड़ी की तरह दिखते हैं उसे वह टेलीस्कोप से घंटों देखती रहती थी। देर रात तक ग्रहों व तारों की तलाश में वह पिता से कितनी ही बार डांट खा चुकी थी। उस समय तक देश पर उदारीकरण की अर्थनीति का राजनीति व आम जीवन पर असर खुलकर दिखने लगा था। सीमा ने ब्रह्मांड की गतिकी को जेडी बरनाल की पुस्तक हिस्टरी ऑफ साइंस के माध्‍यम से समाज की गतिकी के साथ जोड़कर देखना शुरू किया। समसामयिक विज्ञान व दर्शन में आई हुई रुकावट में उसने अपने समाज की गति के सामने बांध दिए गए बंधों को समझना शुरू किया। 1995-96 में छात्र व महिला मोर्चे पर उसकी गतिविधियां बढ़ने लगीं। जूलियस फ्यूचिक की पुस्तक 'फांसी के तख्ते से' को पढ़कर वह सन्नाटे में आ गई थी। उसे पहली बार लगा कि समाज की गति पर बनाई गई भीषण रुकावटें वहीं तक सीमित नहीं हैं। ये रुकावटें तो मनुष्य के जीवन की गति पर लगा दी जाती हैं। सीमा श्रीवास्तव नारी मुक्ति संगठन के मोर्चे पर 2001 तक सक्रिय रहीं जबकि इंकलाबी छात्र मोर्चा के साथ बनी घनिष्ठता2004 तक चली। सीमा ने प्रेम विवाह किया और फिर घर छोड़ दिया। नाम के पीछे लगी जाति को हटाकर आज़ाद लिखना शुरू किया। यह एक नई सीमा का जन्म था- सीमा आज़ाद। उसने पैसे जुटाकर बाइक खरीदी। समाचार खोजने के लिए वह लोगों के बीच गई। लोगों की जिंदगी को खबर का हिस्सा बनाने की जद्दोजेहद में लग गई। उसकी खबरें इलाहाबाद से निकलने वाले अखबारों में प्रमुखता से छपती थीं। वह इलाहाबाद शहर के सबसे चर्चित व्यक्तित्वों में गिनी जाने लगी थी। वह मानवाधिकार, दमन-उत्पीड़न, राजनीतिक-सामाजिक जनांदोलनों, किसान-मजदूरों के प्रदर्शनों का अभिन्न हिस्सा होती गई। उसने जन मुद्दों पर जोर देने व समाज और विचार से लैस पत्रकारिता की ज़रूरत के मद्देनज़र 'दस्तक-नए समय की पत्रिका' निकालनी शुरू की। पत्रिका को आंदोलन का हिस्सा बनाया। उसने हज़ारों किसानों को उजाड़ देने वाली गंगा एक्सप्रेस वे परियोजना के खिलाफ पत्रिका की ओर से गहन सर्वेक्षण किया। इस परियोजना से होने वाले नुकसान को बताने के लिए इसी सर्वेक्षण को पुस्तिका के रूप में छाप कर लोगों के बीच वितरित किया। आज़मगढ़ में मुस्लिम युवाओं को मनमाना गिरफ्तार कर आतंक मचाने वाले एसटीएफ व पुलिस की बरजोरी के खिलाफ दस्तक में ही एक लंबी रिपोर्ट छापी। सीमा की सक्रियता मानवाधिकार के मुद्दों पर बढ़ती गई। वह पीयूसीएल- उत्तर प्रदेश के मोर्चे में शामिल हो गई। उसे यहां सचिव पद की जि़म्मेदारी दी गई। सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी के समय तक उत्तर प्रदेश में युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी सामने थी जो मुखर होकर मानवाधिकारों का मुद्दा उठा रही थी। पतित राजनीति, लूट करने वाली अर्थव्यवस्था, बढ़ती सामाजिक असुरक्षा, दंगा कराने की राजनीति और अल्पसंख्यकों व दलितों के वोट और उसी पर चोट करने की सरकारी नीति के खिलाफ बढ़ती सुगबुगाहट राज्य व केंद्र दोनों के लिए खतरा दिख रही थी। इस सुगबुगाहट में एक नाम सीमा आज़ाद का था। दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले से किताब खरीद कर लौट रही सीमा को देश की सुरक्षा के लिए खतरा घोषित कर उनके पति के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। जब देश प्रेम व देश द्रोह का अर्थ ही बदल दिया गया हो तब यह गिरफ्तारी एक प्रहसन के सिवा और क्या हो सकती है!
सीमा और विश्वविजय को देश के खिलाफ षडयंत्र के अभियोग में दस-दस साल का कठोर कारावास और दस-दस हज़ार रुपये का दंड और देशद्रोह के मामले में दोनों को आजीवन कारावास और बीस-बीस हज़ार रुपये का दंड दिया गया। प्रतिबंधित साहित्य रखने के जुर्म में अलग से सजा। यूएपीए की धाराओं 34ए, 18ए, 20ए, 38 और आईपीसी के तहत कुल 45 साल का कठोर कारावास और आजीवन कारावास की सज़ा दोनों को दी गई। दोनों को ही बराबर और एक ही सज़ा दी गई। इन धाराओं और प्रावधानों पर पिछले दसियों साल से बहस चल रही है। ऐसा लग रहा है कि न्याय की बैसाखी पर मौत की इबारत लिख दी गई है। जो बच जा रहा है उनके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं, पर ईश्वर पर भरोसा करने वाले लोग इसे भगवान की महिमा कहते हैं।

8 जून को कोर्ट में सीमा के पिताजी नहीं आए। वे निराशा और उम्मीद के ज्वार-भाटे में खाली पेट डूब उतरा रहे थे। उस रात वह घर किस तकलीफ से गुज़रा होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। विश्वविजय के अम्मा और बाबूजी केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा पर थे। शायद कोई महिमा हो जाय। मैं खुद पिछली सुनवाइयों को सुनने और न्यायाधीश के रिस्‍पॉन्‍स से इस निष्कर्ष पर पहुंच गया था कि सेशन कोर्ट इतिहास रचने वाला है। मैं अपनी आकांक्षाओं में डूबा हुआ इतिहास रचना के चारित्रिक गुण को ही भूल गया। यह भूलना न तो सायास था और न ही अनायास। बस एक आकांक्षा थी, एक सहज तार्किक इच्छा थी, कि सीमा-विश्वविजय को अब बाहर आ जाना चाहिए और कि यह न्यायाधीश थोड़ा ढंग से सुन और गुन रहा है। हम जेलों में बंद उन लाखों लोगों को भूल ही गए जिन्हें देशद्रोह के आरोप में बेल पर भी नहीं छोड़ा गया है। हम भूल ही गए कि अब तक हज़ारों लोगों को इन्हीं आरोपों के तहत गोली मार दी गई और उसे जेनुइन इनकाउंटर बता दिया गया। हम मनोरमा देवी से लेकर सोनी सोरी तक इतिहास को भूल ही गए। हम भूल ही गए कि देश और देश का भी चारित्रिक गुण होता है। हम भूल ही गए कि शासकों का अपना चरित्र होता है। हम भूल ही गए संसद में बैठे चेहरों का राज़, हम भूल ही गए भूत बंगले की कहानी, हम भूल ही गए गुजरात और बिहार, हम भूल ही गए पाश और फैज़ की नज्‍़म... हम भवदीय आकांक्षाओं में डूबे हुए लोग न्याय की बैसाखी पर उम्मीद की एक किरण फूट पड़ने का इंतजार कर रहे थे...।

यह लिखते हुए इंकलाबी छात्र सभा के हमसफ़र साथी कृपाशंकर- जो कानपुर जेल में है और जिससे मिले हुए सालों गुज़र गए और अब तक मिल पाना संभव नहीं हो पाया- की याद ताज़ा हो आई। वह किस हालात में है, नहीं जानता पर सीमा और विश्वविजय के सामाजिक जीवन को मिला दिया जाय तो उसका प्रोफाइल बनकर तैयार हो जाएगा। गणित, विज्ञान, दर्शन और उतावलेपन का धनी यह मेरा दोस्त जेल की सींखचों में कैसे बंद जीवन जी रहा है,इसे याद कर मन तड़प उठता है। सन 2000 में ऑपरेशन कराने के बाद मैं देहरादून एक साल के लिए रहा। उस समय वह रेलवे की नौकरी में चला गया था। 2002 के आसपास वह मुझसे दिल्ली में मिला और बताया कि उसने नौकरी छोड़ दी है। उसने मुझे बधाई दी। उस समय मैं जनप्रतिरोध का संपादन कर रहा था और एआईपीआरएफ के लिए जनसंगठनों का मोर्चा बनाकर किसान व मज़दूर विरोधी नीतियों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन में भागीदार हो रहा था। इराक पर हमले के लिए खिलाफ व्यापक संयुक्त मोर्चे में काम करते हुए मैं दिल्ली वाला बन रहा था। और उसने अपने बारे में बताया कि वह किसान मोर्चे पर काम करने का निर्णय ले रहा है और कि वह जल्दी ही नौकरी छोड़ देगा। इस साथी से मुलाकात कर इस बीच के गुज़रे समय के बारे में उससे ज़रूर पूछना है। हालांकि यह पूछना एक औपचारिकता ही होगी। आज के दौर में जनसरोकार और इतिहास की जि़म्मेवारियों में हिस्सेदार होने का एक ही अर्थ है: जनांदोलनों के साथ जुड़ाव और जन के साथ संघर्ष। जिस देश की अर्थव्यवस्था पर सूदखोरों और सट्टेबाजों की इस कदर पकड़ बन चुकी हो कि प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक देश के भविष्य के बारे में सट्टेबाजों की तरह अनुमान लगाने लगे हों, वहां लोगों के सामने दो ही तरह का भविष्य बच रहा है- एक: जिस हद तक हो इस देश को लूट लिया जाय(जिसका परिदृश्य खुलेआम है)। दो: जन के साथ हिस्सेदार हो लूट और कत्लेआम से खुद को और देश को बचा लिया जाय (इस परिदृश्य पर देशद्रोह, नक्सलवाद, माओवाद,आतंकवाद की छाया है)।

यह विकल्प नहीं है। यह अस्तित्व का विभाजन है, जिसे मध्यवर्ग विकल्प के तौर पर देख रहा है और चुन रहा है। यह इसी रूप में हमारे सामने है। आइए, जनांदोलनों और जनसंघर्षों के हिस्सेदार लोगों के पक्ष में अपनी एकजुटता बनाएं और जेलों में बंद साथियों को न्याय की बैसाखियों पर लिखी मौत की इबारत से मुक्त कराने के लिए अपनी एकजुटता ज़ाहिर करें और उनकी रिहाई के लिए जनसमितियों का निर्माण करें।

 लेखक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

                                                                                                                                        जनपथ से  

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

“कम लोग बातें ज्यादा”


विजय प्रताप

मीडिया स्टडीज ग्रुप के टेलीविजन कार्यक्रम सर्वेक्षण (टीपीएस) में मैंने पाया कि कैसे एक छोटा सा समूह टेलीविजन चैनलों में किसी मुद्दे पर होने वाली बहसों में एकाधिकार बनाए रखता है। सेना में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर हुई बहस में चार वर्गों के 54 लोग ही घूम फिरकर छाए रहें। मीडिया स्टडीज ग्रुप के टेलीविजन कार्यक्रम सर्वेक्षण (टीपीएस) के तहत एक सर्वेक्षण में मुझे विभिन्न मुद्दों पर आयोजित बहसों में हिस्सेदारी की पृष्ठभूमि की कई दिलचस्प जानकारियां मिली ।

‘कम लोग बातें ज्यादा’ नाम से किए गए इस सर्वे में हिन्दी और अंग्रेजी के तीन-तीन चैनलों के 26 मार्च से 2 अप्रैल के बीच प्रसारित किए गए 24 कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वालों को शामिल किया गया है। सर्वे के परिणाम बताते हैं कि टेली बहस में भाग लेने वालों में देश की दो राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की 82 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। 24 कार्यक्रमों में कुल 56 प्रतिशत लोग ही घूम फिरकर विभिन्न चैनलों में सेना के लिए खरीददारी में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करते रहे। इसमें सेना के पूर्व अधिकारियों की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत, राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत, पूर्व नौकरशाहों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत और पत्रकारों की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत और अन्य की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत थी। इस मुद्दे पर समाज के व्यापक दायरे का यही प्रतिनिधित्व टेली बहस में दिखाई दिया।
सर्वे में 6 चैनलों पर दिखाए गए 24 कार्यक्रमों को उपलब्धता के आधार पर लिया गया है। 15 कार्यक्रम अंग्रेजी चैनल के और 9 कार्यक्रम हिन्दी चैनल के हैं। सर्वे में टेलीविजन चैनलों पर आयोजित बहसों में हिस्सेदारों का विश्लेषण में पाया गया है कि महिलाओं की हिस्सेदारी 9 प्रतिशत रही। सेना का प्रतिनिधित्व करने वाले टिप्पणीकारों में एक भी महिला नहीं है, जबकि पूर्व नौकरशाहों में एक मात्र महिला टिप्पणीकार ने अंग्रेजी के एक कार्यक्रम में हिस्सेदारी की। अंग्रेजी के ही चैनल पर एक मात्र महिला पत्रकार ने हिस्सेदारी की। राजनीतिक दलों की तरफ से तीन महिलाओं ने हिस्सेदारी की। इनमें कांग्रेस की दो महिला प्रवक्ताओं ने हिन्दी के चैनलों पर बहस में हिस्सा लिया तो भाजपा की एक मात्र महिला प्रवक्ता ने अंग्रेजी कार्यक्रम में हिस्सेदारी की। हम लोगों का यह ग्रुप पिछले छह वर्षों से मीडिया से संबंधित कई सर्वे और शोध कर रहा है। हाल ही में ग्रुप की ओर से अवनीश का ‘डीडी उर्दू चैनल’ पर किया गया सर्वे चर्चा में आया है।
सेना का प्रतिनिधित्व करने वाले हिस्सेदारों में एक सैन्य अधिकारी ने 6 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उनका अकेले कुल कार्यक्रमों में पच्चीस प्रतिशत हिस्सेदारी और बाकी सैन्य टिप्पणीकारों में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। सेना के कुल चार प्रतिनिधियों की कुल कार्यक्रमों में हिस्सेदारी 75 प्रतिशत रही। राजनीतिक दलों में कांग्रेस के एक प्रवक्ता की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत रही है। वे केवल अंग्रेजी के चैनलों पर दिखे। अंग्रेजी के चैनलों में उनकी अकेले की हिस्सेदारी एक तिहाई थी।
नौकरशाहों की मौजूदगी टेलीविजन चैनलों की बहसों में केवल अंग्रेजी के चैनलों में ही देखी गई। हिन्दी चैनलों के पास बहस के लिए एक भी पूर्व नौकरशाह नहीं था। हमारे इस ग्रुप के अध्यक्ष पत्रकार एवं पत्रकारिता के प्रोफेसर अनिल चमड़िया हैं।

सर्वे का विस्तृत ब्यौरा

सेना में खरीददारी में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 26 मार्च से 2 अप्रैल के बीच टेलीविजन चैनलों पर बहसें आयोजित की गई। यह सर्वे उन बहसों में हिस्सेदार लेने वालों के बारे में हैं।
इस सर्वे का उद्देश्य टेलीविजन चैनलो पर होने वाली बहसों में हिस्सेदारी का विश्लेषण करना है।
सर्वे में हिन्दी और अंग्रेजी के तीन तीन चैनलों के 24 कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वालों को शामिल किया गया है।
हिन्दी चैनलों के नौ कार्यक्रमों को शामिल किया गया है जबकि अंग्रेजी के 15 कार्यक्रमों को शामिल किया गया है। यह कार्यक्रमों की उपलब्धता के आधार पर किया गया है।
इन बहसों में कुल 54 लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें 5 महिलाओं की हिस्सेदारी थी।
इन बहसों और विमर्शों में कुल 17 सैन्य अधिकारियों ने हिस्सा लिया। उनकी हिस्सेदारी 31 प्रतिशत रही।

सैन्य प्रतिनिधित्व का विश्लेषण

1) एक सैन्य अधिकारी ने 6 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उनकी कुल कार्यक्रमों में पच्चीस प्रतिशत और हिस्सेदारों में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी रही।
2) तीन सैन्य अधिकारियों ने 4 - 4 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस तरह केवल चार अधिकारियों ने 75 प्रतिशत कार्यक्रमों में हिस्सेदारी की।
3) तीन सैन्य अधिकारियों ने 3-3 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस तरह 24 कार्यक्रमों में 7 सैन्य अधिकारी ऐसे थे जो किसी ना किसी एक बहस में उपस्थित रहे।
4) 6 सैन्य अधिकारियों ने केवल अंग्रेजी चैनलों, 9 ने केवल हिंदी चैनलों और दो ने दोनों चैनलों में हिस्सा लिया।
5) बहस में शामिल सैन्य अधिकारियों में एक भी महिला नहीं है।

राजनीतिक दलों के हिस्सेदारों का विश्लेषण

1) राजनीतिक दलों के कुल 17 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। उनकी हिस्सेदारी 31 प्रतिशत रही।
2) सभी प्रतिनिधि पांच राजनीतिक दलों से थे।
3) इन कार्यक्रमों में कांग्रेस के 8 और भाजपा के 6 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कुल राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों में इन दोनों दलों की हिस्सेदारी 82 फीसद रही।
4) कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी ने 5 और भाजपा के तरुण विजय ने 3 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। ये सभी कार्यक्रम अंग्रेजी चैनलों के थे। भाजपा के भूपेंद्र यादव हिंदी के दो कार्यक्रमों में रहे।
5) 17 प्रतिनिधियों में से केवल एक जनता दल यूनाइटेड के साबिर अली क्षेत्रीय दल से हिंदी के कार्यक्रम में थे।
6) 17 प्रतिनिधियों में सीपीआई के केवल एक प्रतिनिधि डी राजा अंग्रेजी के कार्यक्रम में थे।
7) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तारिक अनवर हिंदी के दो कार्यक्रमों में मौजूद रहे।
8) इन कार्यक्रमों में कांग्रेस की 2 और भाजपा की 1 महिला प्रवक्ता शामिल हुईं। कांग्रेस की दोनों प्रवक्ता हिंदी चैनलों पर और भाजपा की प्रवक्ता अंग्रेजी के चैनल पर रही।

नौकरशाहों की हिस्सेदारी का विश्लेषण

1) कुल 7 नौकरशाहों ने हिस्सा लिया। उनकी हिस्सेदारी 13 प्रतिशत रही।
2) सभी नौकरशाहों की उपस्थिति अंग्रेजी के दो चैनलों में थी।
3) 3 नौकरशाह 2-2 कार्यक्रम में उपस्थित थे।
4) कार्यक्रमों में एक महिला नौकरशाह अंग्रेजी चैनल पर मौजूद रही।

हिस्सेदार पत्रकारों का विश्लेषण

1) इन बहसों और विमर्शों में रक्षा मामलों से जुड़े चैनलों में कार्यरत पत्रकारों के अलावा कुल 7 पत्रकारों ने हिस्सा लिया।
2) 24 कार्यक्रमों में सीएनएन आईबीएन के कार्यक्रमों की संख्या 7 है।
3) सीएनएन आईबीएन ने अपने 2 पत्रकारों को 2 कार्यक्रमों का हिस्सेदार बनाया।
4) एनडीटीवी ने एक कार्यक्रम में अपने एक पत्रकार को हिस्सेदार बनाया।
5) 7 में एक पत्रकार ने 4 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, एक ने 3 और एक ने 2 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इन तीन पत्रकारों की कार्यक्रमों में हिस्सेदारी 37 और हिस्सेदारों में 42 फीसद रही।
6) सबसे ज्यादा 5 पत्रकार हिंदी के चैनल एनडीटीवी इंडिया के कार्यक्रम में आए।
7) एक मात्र महिला पत्रकार अंग्रेजी चैनल में हिस्सेदार रही

इन कार्यक्रमों में सैन्य अधिकारियों, नौकरशाहों, पत्रकारों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के अलावा तीन अन्य लोग भी इनके हिस्सेदार बने।

1) एन हनुमनथप्पा ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ एससी, एसटी, ओबीसी, माइनॉरिटी वेलफेयर एसोसिएशन के कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष हैं। उन्होंने 2009 में ही सेना से जुड़ी खरीद-फरोख्त में घपलों की शिकायत की थी। वे अंग्रेजी के दो कार्यक्रम के हिस्सेदार रहे।
2) भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) के पूर्व ठेकेदार अनिल बक्शी एनडीटीवी 24/7 के दो कार्यक्रमों में रहे।
3) सीएसडीएस के फेलो अभय कुमार दूबे एनडीटीवी इंडिया के एक हिन्दी कार्यक्रम में रहे।

3) सीएसडीएस के फेलो अभय कुमार दूबे एनडीटीवी इंडिया के एक हिन्दी कार्यक्रम में रहे।

शनिवार, 24 मार्च 2012

'कोई मुझे बचा ले'


वरुण शैलेश

हाल में पंजाब के मनसा जिले में एक पुलिसकर्मी व्दारा एक लड़की को निर्मता से पीटने का मामला सामने आया है। इस घटना को मीडिया में शर्मनाक बताया गया। बेशक यह घटना शर्मसार और पुलिसिया रवैये को उजागर करने वाली है। मगर एक सवाल हमेशा उठता है कि इस देश को शर्म केवल किसी संभ्रांत महिला के प्रति हुए उत्पीड़न पर आती है। क्या यह शर्म किसी आदिवासी महिला को थाने में बैठाकर उसके गुप्तांगों में पत्थर भरने से नहीं आती है। यह बेहद अफसोसजनक है जिस पुलिस अफसर के इशारे पर इस कुकृत्य को अंजाम दिया गया उसे भारत सरकार ने मेडल से सम्मानित किया। इससे सरकार की आदिवासी महिलाओं की अस्मिता और मानवीय सम्मान को लेकर कितनी गैरजिम्मेदार है। सम्मान देने पर महिला संगठनों का दिल्ली में प्रदर्शन भी हो चुके हैं। सोनी सोड़ी छत्तीसगढ़ में शिक्षिका हैं और उन्हें नक्सलियों का मददगार बताकर जेल में रखा गया है।कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि सोनी सोड़ी के निजी अंगों में पत्थर डाले गए थे। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जा चुकी है। लेकिन न्यायपालिका भी चुप है। सोनी सोड़ी की चिट्ठी एक असहाय स्त्री के तकलीफ को बयां करने के लिए काफी है। लेकिन ऐसी स्थिति में न्याय की किससे उम्मीद की जाए। सोड़ी लगातार अपने पत्रों से पुलिस उत्पीड़न के बारे में बता रही हैं। मगर उनकी मदद को कोई सामने नहीं आ रहा है। संसद में आदिवासी प्रतिनिधियों की तादाद भी अच्छी-खासी है, लेकिन अभी तक वे सोनी सोड़ी को लेकर उदासीन ही दिख रहे हैं। ऐसे में आदिवासी संगठनों की सक्रियता और उनके औचित्य पर भी सवाल खड़े होते हैं। हालांकि देशभऱ में आदिवासी तमाम मोर्चों पर लड़ रहे हैं।

पुलिस के बर्ताव को हम यहां तो बताने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन फिर भी उनकी कुछ लाइनों को सामने रख रहे हैं।‘1. मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है। 2. जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी। 3. पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि ‘तुम रंडी औरत हो, इस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।‘

पुलिस का रवैया पूरे मामले में देश छोड़कर जा चुके अंग्रेजों के सामान है शायद उससे भी कहीं ज्यादा निर्मम। ऐसा लग रहा है जैसे इस मामले में वह अंग्रेजों की क्रूरता से आगे निकलने की चेष्टा में है। बचपन में कहानियां सुनते थे कि अंग्रेज सिपाहियों से अपनी इज्जत बचाने के लिए सैकड़ों महिलाओं ने कुएं में कूदकर जान दी अथवा आग में जलकर अपनी अस्मिता बचाई थीं। मगर आज घर के अंग्रेजों से भारतीय महिला कैसे अपनी इज्जत बचाए। क्या आज भी हम यह कहने की स्थिति में हैं कि अंग्रेज इस देश को छोड़कर जा चुके हैं और हम उनकी प्रताड़ना से आजाद हैं।

असल में, भारतीय समाज का एक बड़ा ढांचा कमजोर, गरीब, दलित और आदिवासी समुदाय को मानवेतर आंकता है। इसी ढांचे से नौकरशाही का तानाबाना भी बना है, जो खुद को शोषक के बतौर पेश करने में गौरवान्वित महसूस करता है। देश के शर्म का सवाल कब खड़ा होता है ? ऐसी घटना किसी सभ्रांत घर की महिला के साथ होता तो संभवत: शर्म का सवाल बनता। मगर सोनी सोड़ी की पीड़ा तमाम उन सामान्य घटनाओं जैसी लगती है जिनकी अमूमन नियति मानकर अनदेखी कर दी जाती है। नियति का खाका पीड़ित समुदाय के असहाय होने से तैयार होता है। उसके पास इन तमाम साजिशों से निपटने के लिए सचेत और मजबूत शख्सियतों का अभाव है। लोकतंत्र का विज्ञापन करने वाली सत्ता आदिवासी नेतृत्व या शख्सियत के खड़े होने में भी अड़ंगे डालती नजर आती है। इसका उदाहरण सोनी सोड़ी के भतीजे पत्रकार लिंगाराम कोडोपी को जेल में डालना है। क्या कोई गैर आदिवासी पत्रकार कोडोपी से बेहतर उनकी समस्याओं को उठा सकता है। कोडोपी को नक्सली मददगार बताकर उसे जेल में डालना आदिवासी समाज की आवाज कुंद करने की कोशिश को दर्शाता है।

शनिवार, 4 जून 2011

डाकघरों में निजीकरण का बढ़ता दायरा

अनिल चमड़िया

यूपीसी की सेवा का इस्तेमाल देश में करोड़ों लोग करते हैं लेकिन उसके इस्तेमाल करने वाले लोगों से इस संबंध में कोई बात करने की जरूरत नहीं समझी गई। आखिर इस सेवा से किसे नुकसान हो रहा था? क्या डाकघरों पर इससे कोई अतिरिक्त वित्तीय या कर्मचारियों का बोझ बढ़ रहा था ? डाक विभाग के नौकरशाहों के पास इसका कोई जवाब नहीं है

निजीकरण का अर्थ केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक क्षेत्र की किसी सेवा को निजी कंपनी को दे दिया जाए। शासन में निजीकरण की प्रक्रिया कई स्तरों पर चलती है और व्यवस्था की नीति जब निजीकरण की है तो उससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं हो सकता है। देश भर में भारतीय डाक व्यवस्था का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मार्च 2010 तक शहरी इलाकों में डाकघरों की संख्या 15797 एवं ग्रामीण इलाकों में एक लाख 39 हजार 182 थी। भारतीय डाकघरों से सरकार को तीन वित्तीय वर्षो 2007-08 से 2010 तक 18 हजार करोड़ से ज्यादा का लाभ हुआ है। देश में डाकघरों के पूरे ढांचे के निजीकरण के प्रयास कई स्तरों पर चल रहे हैं।

कूरियर कंपनियों का व्यवसाय बढ़ाने के उद्देश्य से रजिस्र्टड पत्र और पार्सलों की सेवा दर बेतहाशा बढ़ा दी गई थी। निजीकरण की एक प्रक्रिया को और समझने की जरूरत है। वह है भरोसे को खंडित करने की प्रक्रिया तैयार होना। सार्वजनिक क्षेत्र पर लोगों को ज्यादा भरोसा होता है क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में लोगों के राजनीतिक आंदोलन होते हैं। इस भरोसे को दो तरह से तोड़ा जाता है। एक तो गैर जिम्मेदार होने का एहसास कराकर और दूसरे लोगों की क्षमता से ज्यादा सेवा दरों को बढ़ाकर। डाकघरों में दोनों ही तरह के प्रयास चल रहे हैं। डाकघरों में कई तरह की सेवाएं दी जाती हैं। उनमें गरीबों और मध्यम वर्गों के लिए एक जैसी लेकिन अलग अलग सेवाओं का एक ढांचा बना हुआ है। इसके उदाहरण के लिए रजिस्र्टड और डाक के लिए प्रमाण पत्र जैसी दो सेवाओं को लिया जा सकता है। रजिस्र्टड डाक में 20 रुपये से ज्यादा का भुगतान करना होता है तो डाक के लिए प्रमाण पत्र की सेवा ज्यादा से ज्यादा आठ रुपये खर्च करके ली जा सकती है। डाक के लिए प्रमाण पत्र की सेवा के तहत जो पत्र लेटर बॉक्स में डाला जाता है, उसे पोस्ट मास्टर के हाथों में दे दिया जाता है। पत्र लेते समय पोस्ट मास्टर एक कागज पर पत्र प्राप्ति की मुहर लगा देता है। उस कागज पर पत्र भेजने वाले को जिस पते पर पत्र भेजा रहा है वह पता लिखना होता है और उस पर तीन रुपये का टिकट लगाना होता है। इन तीन रुपयों में पत्र भेजने वाला एक साथ तीन पतों पर पत्र भेजने का प्रमाण पत्र हासिल कर सकता है। डाकघरों और कूरियर कंपनियों के महंगे होने के साथ डाक के लिए प्रमाण पत्र सेवा का चलन तेजी से बढ़ा है।

सूचना का अधिकार कानून 2005 के बनने के बाद सूचना के अधिकार कार्यकर्ता व जागरूक नागरिकों द्वारा भी इसका इस्तेमाल बढ़ा है। सूचना के अधिकार कानून में थोड़ा पैसा खर्च करने की क्षमता रखने वालों के लिए दस रुपये की फीस तय की गई तो गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के लिए दस रुपये दिए बिना ही सूचनाएं लेने का अधिकार दिया गया। लेकिन सरकार ने अब एक तीर से दो निशाने किए। भारतीय डाक से डाक का प्रमाण पत्र यानी यूपीसी की सेवा समाप्त कर दी गई। मजे की बात यह है कि यह सेवा इतने गुपचुप तरीके से समाप्त की गई कि महीनों पता ही नहीं चला। जबकि इस सेवा को समाप्त करने की प्रक्रिया के तहत पहले डाक विभाग की नौकरशाही ने प्रस्ताव तैयार किया। उसके बाद इसके लिए मंत्री कपिल सिब्बल की स्वीकृति ली और बाद में इसे संसद के गजट में प्रकाशति भी किया गया। दरअसल इस दौर में तमाम लोक प्रतिनिधित्व वाली संस्थाएं कई तरह के बड़े-बड़े फैसले चुपचाप कर लेने की इजाजत देने के सबसे ज्यादा काम आ रही हैं। यूपीसी की सेवा का इस्तेमाल देश में करोड़ों लोग करते हैं लेकिन उसके इस्तेमाल करने वाले लोगों से इस संबंध में कोई बात करने की जरूरत नहीं समझी गई। आखिर इस सेवा से किसे नुकसान हो रहा था? क्या डाकघरों पर इससे कोई अतिरिक्त वित्तीय या कर्मचारियों का बोझ बढ़ रहा था ? डाक विभाग के नौकरशाहों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। जबकि यह सेवा कितनी पुरानी है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इसकी भारतीय डाक अधिनियम 1935 में भी र्चचा है।

सवाल है कि जिस सेवा से डाकघरों को लाभ ही लाभ हो रहा हो और उसका इस्तेमाल भी लगातार बढ़ रहा हो तो यह आदर्श स्थिति कैसे लोगों को खटक सकती है लेकिन इससे निजीकरण की प्रक्रिया तेज होती है। जो लोग यूपीसी सेवा का इस्तेमाल करते रहे हैं, उसके बंद हो जाने के बाद वे क्या करेंगे। उनके पास एक ही विकल्प है कि वे डाक का प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए डाक घरों में रजिस्र्टड कराने के लिए लंबी लाइन में लगें। लंबी लाइन इसीलिए होती है क्योंकि वहां कर्मचारियों पर पहले ही काम का बोझ ज्यादा है। जाहिर है कि तब अपने डाक का प्रमाण पत्र लेने के लिए कूरियर के बाजार की तरफ जाना होगा। इस सेवा के बंद करने के साथ दो और मजेदार बातें सरकार के मुंह से सुन लेनी चाहिए। सरकार ने संसद में नौ अगस्त 2010 को यह मानने से इंकार किया कि लोगों में डाकघरों की जरूरत कम हो रही है। यानी तमाम तरह की सूचना प्रद्योगिकी के बावजूद डाक घरों की जरूरत बढ़ रही है। दूसरी बात सरकार ने 15 नवम्बर 2010 को लोकसभा में ही कहा कि ग्रामीण इलाकों की बदतर सामाजिक और आर्थिक हालत देखते हुए ग्रामीण इलाको में डाकघरों के खोलने के संबंध में जो वित्तीय व आबादी के मानक तय किए गए हैं, उसके प्रति सरकार ने अपना रुख लचीला किया है। इन बातों के बावजूद डाक का प्रमाण पत्र जैसी सेवा को समाप्त करने का क्या मकसद हो सकता है?

दरअसल, पूंजीवादी लॉबी की सरकार के भीतर बुरी तरह पैठ हो चुकी है। वह बेहद निडरता और निर्लज्जता से वैसे फैसले कर रही है जिससे आम आदमी का सीधा सीधा रिश्ता है। दूसरी तरफ यह एक विपरीत स्थिति हो गई है कि बड़ी आबादी को प्रभावित करने वाले फैसलों को महज पैसे के आकार के कारण छोटा मानकर उसके विरोध में कोई बोलने को तैार नहीं दिखता है। देश में जो राजनीतिक सोच की धारा परिवर्तनगामी थी, वह पूरी तरह से मध्यवर्गीय चरित्र में ढल चुकी है। संसद में ही डाकघरों से संबंधित सवालों पर एक नजर डालें तो दिखाई देगा कि सांसदों का सरोकार डाकघरों की उन सेवाओं से नहीं है जिसका इस्तेमाल गरीब-गुरबा करता है। संसद के बाहर गरीब गुरबों की बात करने वाला भी इस तरफ नहीं सोच पाता। इस तरह का रुख तब भी देखने को मिला था जब सरकार ने देश के सभी लोगों को आयोडीनयुक्त नमक खाना अनिवार्य कर दिया और आयोडीन युक्त नमक के ब्रांड पैकेटों की मनमानी कीमत रखने की छूट दे दी गयी। तब से दो तीन रूपये किलों का नमक पांच छह गुना ज्यादा दाम से बिकता आ रहा है और कंपनियां करोड़ों कमा रही है। सरकार ने एक फार्मूला सा बना लिया है कि इस तरह के फैसले लो ताकि विरोध भी न हो और पूंजीवाद का विस्तार भी किया जा सके।

साभार : राष्ट्रीय सहारा

रविवार, 22 मई 2011

अधिग्रहण की पीड़ा

भूमि अधिग्रहण का संकट केवल भट्ठा-पारसौल तक सीमित नहीं है। आज देश में ऐसी कई अधिग्रहण हैं, जो खबर बन पाने के लिए तरस रहे हैं। भूमि अधिग्रहण से जुड़ी त्रासदी की एक कहानी उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाला हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के सहारे लिखी जा रही है। जहां हथुआ तक रेल पटरी बिछाने को लेकर 112.49 एकड़ जमीन के अधिग्रहण का नोटिस किसानों को मिल चुका है। लेकिन किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पूर्वांचल के किसान लामबंद होकर पिछले तीन महीने से क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के लिए अधिग्रहित की जाने वाली जमीन की चपेट में 14 गांव हैं। जमीन अधिग्रहण की घोषणा होने के बाद इलाके में कुछेक घटनाएं किसानों के सामने पैदा हुए संकट का आभास कराती हैं। घटना इस साल 22 फरवरी की है। जब भूमि अधिग्रहण के विरोध में क्रमिक अनशन पर बैठे देवरिया जिले में बनकटा गांव के राम बरन चौहान की हार्ट अटैक से मौत हो गई। 55 वर्षीय राम बरन के पास महज 11 कट्ठा जमीन थी। जिसमें से नौ कट्ठा जमीन रेल पटरी के लिए ले ली गई । सब्जी की खेती कर गुजारा करने वाले राम बरन के सामने बाकी बची 2 कट्ठा जमीन पर गुजारा करना संभव नहीं रह गया था। पीड़ा और भविष्य की आशंका ने इस कदर घेरा कि दिल पर बन आयी। वैसे रामबरन की मौत इलाके में पहली घटना नहीं है। प्रस्तावित रेलमार्ग के लिए वर्ष 2006 में जमीन की पैमाइश के दौरान अपनी जमीन पर पत्थर गाड़ते देख रायबरी चौरिया गांव के सरल खेत में ही गिर पड़े। सरल भी जमीन छिनने के सदमे का शिकार हुए और दिल का दौरा मौत का बहाना बन गया।

दिल के दौरे से दो किसानों की मौत यह बताने के लिए काफी है कि किसी किसान के लिए जमीन का मामला महज आर्थिक नहीं है। किसान का जमीन से भावनात्मक नाता भी होता है। एक किसान अपने खेतों के कई नाम रखकर पुकारता है। कहें तो जमीन के साथ रिश्तों की तमाम कड़ियां जोड़ता है। ऐसे में जमीन छिनने का मतलब चट्टान के दरकने की तरह होता है,जिससे किसान का पूरा जीवन अनिश्चितता की खाई में चला जाता है। जमीन से मानवीय संवेदनाएं इस कदर जुड़ी हुई हैं कि जमीन बेंचने वालों को समाज सम्मान की निगाह से नहीं देखता है। जमीन का होना हैसियत तय करता है, यहां तक कि शादी-व्याह का निर्णायक पहलू बनता है। लेकिन विकास से आयातित व्याख्या में किसानों व आदिवासियों की इस मार्मिकता की कोई जगह नहीं है।

जमीन अधिग्रहण के समय छोटे किसान व भूमिहीन किसानों का संकट सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। जिन्हें मिला मुआवजा किसी धोखे से कम नहीं होता है। जानना जरूरी है कि भारतीय कृषक परंपरा में किसान के लिए जमीन महज जीविका ही नहीं,बल्कि सोचने-समझने की ताकत होती है। यानी एक किसान खेती के काम के लिए ही कुशल होता है। लेकिन जब उसकी जमीन छिनती है तो उसकी खेतीगत कुशलता भी खारिज होती है। जिसके चलते रामबरन और सरल जैसे तमाम किसान अकुशलता वाले पेशे को करने शहर जाने या दूसरा रोजगार अपनाने के लिए मजबूर होते हैं।

विकास के मौजूदा मॉडल जनभावनाओं का ख्याल रख पाने में नाकाम हैं। यही वजह है कि सरकारों के विकास के दावे महज आर्थिक विकास दर तक केंद्रित होकर रह गये हैं। जनजीवन की गुणवत्ता में सुधार के दावे विज्ञापननुमा है,जिसकी सच्चाई भूख से होने वाली मौतें बयान करती है। कुल मिलाकर लागू आर्थिक नीतियों में भारतीय जनता की भलाई न के बराबर है। लिहाजा न केवल भूमि अधिग्रहण कानून में संसोधन की मांग होनी चाहिए,बल्कि इसके साथ-साथ शोषणकारी व्यवस्था को पोषित करने वाली आर्थिक नीतियों की समीक्षा की भी मांग होनी चाहिए। ताकि जनता व उसकी भावनाओं को बेदम होने से रोका जा सके।



शनिवार, 7 मई 2011

जामिया के छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे


परीक्षा सिर पर है और जामिया के छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने को मजबूर हैं। एक बार फिर से वजह बना है वीसी का अड़ियल रवैया। दरअसल जामिया विश्वविद्यालय में एम.ए.मॉस कम्यूनीकेशन के फर्स्ट ईयर और फाइनल ईयर के 13 विद्यार्थियों को परीक्षा देने से रोक दिया गया है। जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसका कारण तय प्रतिशत से कम उपस्थिति बताया है। हालांकि विश्वविद्यालय के प्रावधानो के अनुसार छात्रों ने मेडिकल सर्टिफिकेट जमा कर के उपस्थिति में 15% की छूट हासिल करने की कोशिश की लेकिन छात्रों का भविष्य खराब करने पर उतारू वीसी और विश्वविद्यालय प्रशासन ने पेश किये गये मेडिकल सर्टिफिकेट को मानने से इंकार कर दिया। वि.वि.प्रशासन का तर्क है कि 15 दिन के भीतर मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं जमा कराया गया है,जबकि विश्वविद्यालय नियमावली में ऐसी किसी शर्त की जानकारी नहीं दी गई है।

गौरतलब है कि जिन 13 छात्र-छात्राओं को परीक्षा देने से रोका गया है,उनमें 3 छात्र-छात्राओं की उपस्थिति 65 % से ऊपर,7 छात्र-छात्राओं की उपस्थिति 70% से ऊपर,2 छात्र-छात्राओं की 60 % ऊपर है। इसे देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि इन छात्रों में कोई भी अपनी उपस्थिति को लेकर लापरवाह था। लेकिन जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे मामले में छात्र हित को सिरे खारिज कर दिया है।

दरअसल छात्रों के लिए 75 प्रतिशत की अनिवार्य उपस्थिति के नियम की मूल भावना ये है कि छात्र कक्षाओं में आएंगे तो कुछ सीखेंगे। इस नियम का अंतिम लक्ष्य यही है कि छात्र अधिक से अधिक सीखें,लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाला छात्र लेबोरेटरी में नहीं सीख सकता। उसके सारे प्रयोग समाज को जानने और समझने से संबंधित होते हैं। बिना उनके बीच जाए पत्रकारिता को समाजोपयोगी नहीं बनाया जा सकता। क्लास में रटी गई परिभाषाओं के आधार पर परीक्षा तो पास की जा सकती है लेकिन कार्यक्षेत्र में व्यवहारिक अनुभव ही काम आता है।

इस मामले में हाईकोर्ट के जज ने वाइस चांसलर से अनुरोध भी किया था कि वे अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर समस्या का समाधान कर सकते हैं,लेकिन वाइस चांसलर ने इस सलाह को मानने से इंकार दिया। जाहिर है, वीसी अगर उपस्थिति के नियम की मूल भावना का ख्याल रखते तो हाईकोर्ट के एक जज को इस तरह की सलाह देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन इस पूरे मामले से साफ है कि वीसी को विद्यार्थियों के हित की कोई चिंता नहीं है और सिर्फ एक नियम की आड़ में वे विद्यार्थियों पर तानाशाही कायम करना चाहते हैं।

जेयूसीएस मानता है कि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को उपस्थिति के आधार पर परीक्षा से नहीं रोका जा सकता है। क्योंकि पत्रकारिता को केवल कक्षा के दायरे में नहीं समझा जा सकता है। पत्रकारिता को समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए जरूरी है कि इसके विद्यार्थी सामाजिक गतिविधियों,आंदोलनों को नजदीक से देखें। जिसके लिए विद्यार्थियों को कक्षा से बाहर जाने की छूट होनी चाहिए। लिहाजा पाठ्यक्रम बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो विद्यार्थी कक्षा के बाहर जाकर काम कर रहे हैं,उसे भी उनकी पढ़ाई का हिस्सा माना जाए। पत्रकारिता पाठ्यक्रम में ऐसी कोई व्यवस्था न होना संस्थागत कमी है। जिसे दूर करने के बजाय जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है।

वीसी के अड़ियल और नौकरशाहीपूर्ण रवैये को देखते हुए जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने देने की मांग का समर्थन करता है। छात्र हित को देखते हुए आप सभी लोगों से निवेदन है कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की मांग के समर्थन में आगे आये।

जेयूसीएस की तरफ से जारी -

शाहआलम, अली अख्तर, गुफरान,शारिक, अवनीश राय, विजय प्रताप, ऋषि कुमार सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह, अरूण कुमार उरांव, प्रबुद्ध गौतम, अर्चना महतो, विवेक मिश्रा, राकेश, देवाशीष प्रसून, दीपक राव, प्रवीण मालवीय, ओम नागर, तारिक, मसीहुद्दीन संजरी, वरूण, मुकेश चौरासे,. शाहनवाज आलम, नवीन कुमार,

9873672153, 9910638355, 9313139941, 09911300375