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शनिवार, 4 जून 2011

डाकघरों में निजीकरण का बढ़ता दायरा

अनिल चमड़िया

यूपीसी की सेवा का इस्तेमाल देश में करोड़ों लोग करते हैं लेकिन उसके इस्तेमाल करने वाले लोगों से इस संबंध में कोई बात करने की जरूरत नहीं समझी गई। आखिर इस सेवा से किसे नुकसान हो रहा था? क्या डाकघरों पर इससे कोई अतिरिक्त वित्तीय या कर्मचारियों का बोझ बढ़ रहा था ? डाक विभाग के नौकरशाहों के पास इसका कोई जवाब नहीं है

निजीकरण का अर्थ केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक क्षेत्र की किसी सेवा को निजी कंपनी को दे दिया जाए। शासन में निजीकरण की प्रक्रिया कई स्तरों पर चलती है और व्यवस्था की नीति जब निजीकरण की है तो उससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं हो सकता है। देश भर में भारतीय डाक व्यवस्था का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मार्च 2010 तक शहरी इलाकों में डाकघरों की संख्या 15797 एवं ग्रामीण इलाकों में एक लाख 39 हजार 182 थी। भारतीय डाकघरों से सरकार को तीन वित्तीय वर्षो 2007-08 से 2010 तक 18 हजार करोड़ से ज्यादा का लाभ हुआ है। देश में डाकघरों के पूरे ढांचे के निजीकरण के प्रयास कई स्तरों पर चल रहे हैं।

कूरियर कंपनियों का व्यवसाय बढ़ाने के उद्देश्य से रजिस्र्टड पत्र और पार्सलों की सेवा दर बेतहाशा बढ़ा दी गई थी। निजीकरण की एक प्रक्रिया को और समझने की जरूरत है। वह है भरोसे को खंडित करने की प्रक्रिया तैयार होना। सार्वजनिक क्षेत्र पर लोगों को ज्यादा भरोसा होता है क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में लोगों के राजनीतिक आंदोलन होते हैं। इस भरोसे को दो तरह से तोड़ा जाता है। एक तो गैर जिम्मेदार होने का एहसास कराकर और दूसरे लोगों की क्षमता से ज्यादा सेवा दरों को बढ़ाकर। डाकघरों में दोनों ही तरह के प्रयास चल रहे हैं। डाकघरों में कई तरह की सेवाएं दी जाती हैं। उनमें गरीबों और मध्यम वर्गों के लिए एक जैसी लेकिन अलग अलग सेवाओं का एक ढांचा बना हुआ है। इसके उदाहरण के लिए रजिस्र्टड और डाक के लिए प्रमाण पत्र जैसी दो सेवाओं को लिया जा सकता है। रजिस्र्टड डाक में 20 रुपये से ज्यादा का भुगतान करना होता है तो डाक के लिए प्रमाण पत्र की सेवा ज्यादा से ज्यादा आठ रुपये खर्च करके ली जा सकती है। डाक के लिए प्रमाण पत्र की सेवा के तहत जो पत्र लेटर बॉक्स में डाला जाता है, उसे पोस्ट मास्टर के हाथों में दे दिया जाता है। पत्र लेते समय पोस्ट मास्टर एक कागज पर पत्र प्राप्ति की मुहर लगा देता है। उस कागज पर पत्र भेजने वाले को जिस पते पर पत्र भेजा रहा है वह पता लिखना होता है और उस पर तीन रुपये का टिकट लगाना होता है। इन तीन रुपयों में पत्र भेजने वाला एक साथ तीन पतों पर पत्र भेजने का प्रमाण पत्र हासिल कर सकता है। डाकघरों और कूरियर कंपनियों के महंगे होने के साथ डाक के लिए प्रमाण पत्र सेवा का चलन तेजी से बढ़ा है।

सूचना का अधिकार कानून 2005 के बनने के बाद सूचना के अधिकार कार्यकर्ता व जागरूक नागरिकों द्वारा भी इसका इस्तेमाल बढ़ा है। सूचना के अधिकार कानून में थोड़ा पैसा खर्च करने की क्षमता रखने वालों के लिए दस रुपये की फीस तय की गई तो गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के लिए दस रुपये दिए बिना ही सूचनाएं लेने का अधिकार दिया गया। लेकिन सरकार ने अब एक तीर से दो निशाने किए। भारतीय डाक से डाक का प्रमाण पत्र यानी यूपीसी की सेवा समाप्त कर दी गई। मजे की बात यह है कि यह सेवा इतने गुपचुप तरीके से समाप्त की गई कि महीनों पता ही नहीं चला। जबकि इस सेवा को समाप्त करने की प्रक्रिया के तहत पहले डाक विभाग की नौकरशाही ने प्रस्ताव तैयार किया। उसके बाद इसके लिए मंत्री कपिल सिब्बल की स्वीकृति ली और बाद में इसे संसद के गजट में प्रकाशति भी किया गया। दरअसल इस दौर में तमाम लोक प्रतिनिधित्व वाली संस्थाएं कई तरह के बड़े-बड़े फैसले चुपचाप कर लेने की इजाजत देने के सबसे ज्यादा काम आ रही हैं। यूपीसी की सेवा का इस्तेमाल देश में करोड़ों लोग करते हैं लेकिन उसके इस्तेमाल करने वाले लोगों से इस संबंध में कोई बात करने की जरूरत नहीं समझी गई। आखिर इस सेवा से किसे नुकसान हो रहा था? क्या डाकघरों पर इससे कोई अतिरिक्त वित्तीय या कर्मचारियों का बोझ बढ़ रहा था ? डाक विभाग के नौकरशाहों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। जबकि यह सेवा कितनी पुरानी है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इसकी भारतीय डाक अधिनियम 1935 में भी र्चचा है।

सवाल है कि जिस सेवा से डाकघरों को लाभ ही लाभ हो रहा हो और उसका इस्तेमाल भी लगातार बढ़ रहा हो तो यह आदर्श स्थिति कैसे लोगों को खटक सकती है लेकिन इससे निजीकरण की प्रक्रिया तेज होती है। जो लोग यूपीसी सेवा का इस्तेमाल करते रहे हैं, उसके बंद हो जाने के बाद वे क्या करेंगे। उनके पास एक ही विकल्प है कि वे डाक का प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए डाक घरों में रजिस्र्टड कराने के लिए लंबी लाइन में लगें। लंबी लाइन इसीलिए होती है क्योंकि वहां कर्मचारियों पर पहले ही काम का बोझ ज्यादा है। जाहिर है कि तब अपने डाक का प्रमाण पत्र लेने के लिए कूरियर के बाजार की तरफ जाना होगा। इस सेवा के बंद करने के साथ दो और मजेदार बातें सरकार के मुंह से सुन लेनी चाहिए। सरकार ने संसद में नौ अगस्त 2010 को यह मानने से इंकार किया कि लोगों में डाकघरों की जरूरत कम हो रही है। यानी तमाम तरह की सूचना प्रद्योगिकी के बावजूद डाक घरों की जरूरत बढ़ रही है। दूसरी बात सरकार ने 15 नवम्बर 2010 को लोकसभा में ही कहा कि ग्रामीण इलाकों की बदतर सामाजिक और आर्थिक हालत देखते हुए ग्रामीण इलाको में डाकघरों के खोलने के संबंध में जो वित्तीय व आबादी के मानक तय किए गए हैं, उसके प्रति सरकार ने अपना रुख लचीला किया है। इन बातों के बावजूद डाक का प्रमाण पत्र जैसी सेवा को समाप्त करने का क्या मकसद हो सकता है?

दरअसल, पूंजीवादी लॉबी की सरकार के भीतर बुरी तरह पैठ हो चुकी है। वह बेहद निडरता और निर्लज्जता से वैसे फैसले कर रही है जिससे आम आदमी का सीधा सीधा रिश्ता है। दूसरी तरफ यह एक विपरीत स्थिति हो गई है कि बड़ी आबादी को प्रभावित करने वाले फैसलों को महज पैसे के आकार के कारण छोटा मानकर उसके विरोध में कोई बोलने को तैार नहीं दिखता है। देश में जो राजनीतिक सोच की धारा परिवर्तनगामी थी, वह पूरी तरह से मध्यवर्गीय चरित्र में ढल चुकी है। संसद में ही डाकघरों से संबंधित सवालों पर एक नजर डालें तो दिखाई देगा कि सांसदों का सरोकार डाकघरों की उन सेवाओं से नहीं है जिसका इस्तेमाल गरीब-गुरबा करता है। संसद के बाहर गरीब गुरबों की बात करने वाला भी इस तरफ नहीं सोच पाता। इस तरह का रुख तब भी देखने को मिला था जब सरकार ने देश के सभी लोगों को आयोडीनयुक्त नमक खाना अनिवार्य कर दिया और आयोडीन युक्त नमक के ब्रांड पैकेटों की मनमानी कीमत रखने की छूट दे दी गयी। तब से दो तीन रूपये किलों का नमक पांच छह गुना ज्यादा दाम से बिकता आ रहा है और कंपनियां करोड़ों कमा रही है। सरकार ने एक फार्मूला सा बना लिया है कि इस तरह के फैसले लो ताकि विरोध भी न हो और पूंजीवाद का विस्तार भी किया जा सके।

साभार : राष्ट्रीय सहारा

रविवार, 22 मई 2011

अधिग्रहण की पीड़ा

भूमि अधिग्रहण का संकट केवल भट्ठा-पारसौल तक सीमित नहीं है। आज देश में ऐसी कई अधिग्रहण हैं, जो खबर बन पाने के लिए तरस रहे हैं। भूमि अधिग्रहण से जुड़ी त्रासदी की एक कहानी उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाला हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के सहारे लिखी जा रही है। जहां हथुआ तक रेल पटरी बिछाने को लेकर 112.49 एकड़ जमीन के अधिग्रहण का नोटिस किसानों को मिल चुका है। लेकिन किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पूर्वांचल के किसान लामबंद होकर पिछले तीन महीने से क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के लिए अधिग्रहित की जाने वाली जमीन की चपेट में 14 गांव हैं। जमीन अधिग्रहण की घोषणा होने के बाद इलाके में कुछेक घटनाएं किसानों के सामने पैदा हुए संकट का आभास कराती हैं। घटना इस साल 22 फरवरी की है। जब भूमि अधिग्रहण के विरोध में क्रमिक अनशन पर बैठे देवरिया जिले में बनकटा गांव के राम बरन चौहान की हार्ट अटैक से मौत हो गई। 55 वर्षीय राम बरन के पास महज 11 कट्ठा जमीन थी। जिसमें से नौ कट्ठा जमीन रेल पटरी के लिए ले ली गई । सब्जी की खेती कर गुजारा करने वाले राम बरन के सामने बाकी बची 2 कट्ठा जमीन पर गुजारा करना संभव नहीं रह गया था। पीड़ा और भविष्य की आशंका ने इस कदर घेरा कि दिल पर बन आयी। वैसे रामबरन की मौत इलाके में पहली घटना नहीं है। प्रस्तावित रेलमार्ग के लिए वर्ष 2006 में जमीन की पैमाइश के दौरान अपनी जमीन पर पत्थर गाड़ते देख रायबरी चौरिया गांव के सरल खेत में ही गिर पड़े। सरल भी जमीन छिनने के सदमे का शिकार हुए और दिल का दौरा मौत का बहाना बन गया।

दिल के दौरे से दो किसानों की मौत यह बताने के लिए काफी है कि किसी किसान के लिए जमीन का मामला महज आर्थिक नहीं है। किसान का जमीन से भावनात्मक नाता भी होता है। एक किसान अपने खेतों के कई नाम रखकर पुकारता है। कहें तो जमीन के साथ रिश्तों की तमाम कड़ियां जोड़ता है। ऐसे में जमीन छिनने का मतलब चट्टान के दरकने की तरह होता है,जिससे किसान का पूरा जीवन अनिश्चितता की खाई में चला जाता है। जमीन से मानवीय संवेदनाएं इस कदर जुड़ी हुई हैं कि जमीन बेंचने वालों को समाज सम्मान की निगाह से नहीं देखता है। जमीन का होना हैसियत तय करता है, यहां तक कि शादी-व्याह का निर्णायक पहलू बनता है। लेकिन विकास से आयातित व्याख्या में किसानों व आदिवासियों की इस मार्मिकता की कोई जगह नहीं है।

जमीन अधिग्रहण के समय छोटे किसान व भूमिहीन किसानों का संकट सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। जिन्हें मिला मुआवजा किसी धोखे से कम नहीं होता है। जानना जरूरी है कि भारतीय कृषक परंपरा में किसान के लिए जमीन महज जीविका ही नहीं,बल्कि सोचने-समझने की ताकत होती है। यानी एक किसान खेती के काम के लिए ही कुशल होता है। लेकिन जब उसकी जमीन छिनती है तो उसकी खेतीगत कुशलता भी खारिज होती है। जिसके चलते रामबरन और सरल जैसे तमाम किसान अकुशलता वाले पेशे को करने शहर जाने या दूसरा रोजगार अपनाने के लिए मजबूर होते हैं।

विकास के मौजूदा मॉडल जनभावनाओं का ख्याल रख पाने में नाकाम हैं। यही वजह है कि सरकारों के विकास के दावे महज आर्थिक विकास दर तक केंद्रित होकर रह गये हैं। जनजीवन की गुणवत्ता में सुधार के दावे विज्ञापननुमा है,जिसकी सच्चाई भूख से होने वाली मौतें बयान करती है। कुल मिलाकर लागू आर्थिक नीतियों में भारतीय जनता की भलाई न के बराबर है। लिहाजा न केवल भूमि अधिग्रहण कानून में संसोधन की मांग होनी चाहिए,बल्कि इसके साथ-साथ शोषणकारी व्यवस्था को पोषित करने वाली आर्थिक नीतियों की समीक्षा की भी मांग होनी चाहिए। ताकि जनता व उसकी भावनाओं को बेदम होने से रोका जा सके।



शनिवार, 7 मई 2011

जामिया के छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे


परीक्षा सिर पर है और जामिया के छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने को मजबूर हैं। एक बार फिर से वजह बना है वीसी का अड़ियल रवैया। दरअसल जामिया विश्वविद्यालय में एम.ए.मॉस कम्यूनीकेशन के फर्स्ट ईयर और फाइनल ईयर के 13 विद्यार्थियों को परीक्षा देने से रोक दिया गया है। जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसका कारण तय प्रतिशत से कम उपस्थिति बताया है। हालांकि विश्वविद्यालय के प्रावधानो के अनुसार छात्रों ने मेडिकल सर्टिफिकेट जमा कर के उपस्थिति में 15% की छूट हासिल करने की कोशिश की लेकिन छात्रों का भविष्य खराब करने पर उतारू वीसी और विश्वविद्यालय प्रशासन ने पेश किये गये मेडिकल सर्टिफिकेट को मानने से इंकार कर दिया। वि.वि.प्रशासन का तर्क है कि 15 दिन के भीतर मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं जमा कराया गया है,जबकि विश्वविद्यालय नियमावली में ऐसी किसी शर्त की जानकारी नहीं दी गई है।

गौरतलब है कि जिन 13 छात्र-छात्राओं को परीक्षा देने से रोका गया है,उनमें 3 छात्र-छात्राओं की उपस्थिति 65 % से ऊपर,7 छात्र-छात्राओं की उपस्थिति 70% से ऊपर,2 छात्र-छात्राओं की 60 % ऊपर है। इसे देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि इन छात्रों में कोई भी अपनी उपस्थिति को लेकर लापरवाह था। लेकिन जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे मामले में छात्र हित को सिरे खारिज कर दिया है।

दरअसल छात्रों के लिए 75 प्रतिशत की अनिवार्य उपस्थिति के नियम की मूल भावना ये है कि छात्र कक्षाओं में आएंगे तो कुछ सीखेंगे। इस नियम का अंतिम लक्ष्य यही है कि छात्र अधिक से अधिक सीखें,लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाला छात्र लेबोरेटरी में नहीं सीख सकता। उसके सारे प्रयोग समाज को जानने और समझने से संबंधित होते हैं। बिना उनके बीच जाए पत्रकारिता को समाजोपयोगी नहीं बनाया जा सकता। क्लास में रटी गई परिभाषाओं के आधार पर परीक्षा तो पास की जा सकती है लेकिन कार्यक्षेत्र में व्यवहारिक अनुभव ही काम आता है।

इस मामले में हाईकोर्ट के जज ने वाइस चांसलर से अनुरोध भी किया था कि वे अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर समस्या का समाधान कर सकते हैं,लेकिन वाइस चांसलर ने इस सलाह को मानने से इंकार दिया। जाहिर है, वीसी अगर उपस्थिति के नियम की मूल भावना का ख्याल रखते तो हाईकोर्ट के एक जज को इस तरह की सलाह देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन इस पूरे मामले से साफ है कि वीसी को विद्यार्थियों के हित की कोई चिंता नहीं है और सिर्फ एक नियम की आड़ में वे विद्यार्थियों पर तानाशाही कायम करना चाहते हैं।

जेयूसीएस मानता है कि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को उपस्थिति के आधार पर परीक्षा से नहीं रोका जा सकता है। क्योंकि पत्रकारिता को केवल कक्षा के दायरे में नहीं समझा जा सकता है। पत्रकारिता को समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए जरूरी है कि इसके विद्यार्थी सामाजिक गतिविधियों,आंदोलनों को नजदीक से देखें। जिसके लिए विद्यार्थियों को कक्षा से बाहर जाने की छूट होनी चाहिए। लिहाजा पाठ्यक्रम बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो विद्यार्थी कक्षा के बाहर जाकर काम कर रहे हैं,उसे भी उनकी पढ़ाई का हिस्सा माना जाए। पत्रकारिता पाठ्यक्रम में ऐसी कोई व्यवस्था न होना संस्थागत कमी है। जिसे दूर करने के बजाय जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है।

वीसी के अड़ियल और नौकरशाहीपूर्ण रवैये को देखते हुए जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने देने की मांग का समर्थन करता है। छात्र हित को देखते हुए आप सभी लोगों से निवेदन है कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की मांग के समर्थन में आगे आये।

जेयूसीएस की तरफ से जारी -

शाहआलम, अली अख्तर, गुफरान,शारिक, अवनीश राय, विजय प्रताप, ऋषि कुमार सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह, अरूण कुमार उरांव, प्रबुद्ध गौतम, अर्चना महतो, विवेक मिश्रा, राकेश, देवाशीष प्रसून, दीपक राव, प्रवीण मालवीय, ओम नागर, तारिक, मसीहुद्दीन संजरी, वरूण, मुकेश चौरासे,. शाहनवाज आलम, नवीन कुमार,

9873672153, 9910638355, 9313139941, 09911300375

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

अमलेन्दु उपाध्याय को जान से मारने की धमकी

प्रति,
सचिव
भारतीय प्रेस परिषद्
नई दिल्ली,


महोदय
पत्रकार संगठन जेयूसीएस आपका ध्यान अपने साथी पत्रकार अमलेन्दु उपाध्याय
को एक हिंदी दैनिक अखबार ‘स्वाभिमान टाइम्स’ के मालिक बनवारी लाल कुशवाहा
द्वारा जान से मारने की धमकी देने की ओर आकृष्ट करना चाहता है। अमलेन्दु
उपाध्याय पिछले काफी समय से इसी अखबार में सह-सम्पादक के पद पर कार्यरत
हैं।



14 मार्च 2011 को उनके मोबाइल फोन 09312873760 पर बनवारी लाल कुशवाहा
मोबइल नंबर 09309052522 से फोन कर भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए उन्हें
जान से हाथ धो बैठने की धमकी दी। बनवारी लाल कुशवाह स्वाभिमान
टाइम्स के मुख्य प्रबंध निदेशक हैं। उनका धौलपुर में दूध का भी धंधा है।
कुशवाहा का कहना था कि 12 मार्च को उनके धौलपुर स्थित प्लांट के उद्घाटन
की 15 फोटो उनके अखबार के पहले पन्ने क्यों नहीं लगाई गई? हालांकि
अमलेंदु उपाध्याय का कहना है कि पहले पन्ने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है।
ऐसे में अमलेंदु उपाध्याय को जान से मारने की धमकी देना संगीन मामला है,
जिसकी पूरी जांच होनी चाहिए।



बनवारी लाल कुशवाहा के इस आपराधिक कृत्य में स्वाभिमान टाइम्स के संपादक
निर्मलेंदु साहा की भी सहभागिता है। निर्मलेंदु साहा भी पहले इस पत्रकार
को धमकियां दे चुके हैं। अखबार के मालिक और संपादक द्वारा एक पत्रकार का
उत्पीड़न न काबिले बर्दाश्त है। यह न केवल पत्रकारिता के उसूलों के खिलाफ
है, बल्कि व्यक्ति के मानवाधिकारों का भी हनन है। चूंकि यह सर्वविदित है
कि कई बड़े अपराधी और काले धन वाले व्यक्ति अपने को पाक साफ बनाए रखने के
लिए मीडिया के धंधे में पैर जमा चुके हैं, जिसके चलते ईमानदार पत्रकारों
की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। ऐसे में यह अहम जिम्मेदारी भारतीय प्रेस
परिषद की है कि वह ऐसी घटनाओं की पुनरावृति रोके।
महोदय हमें दुखः के साथ कहना पड़ रहा है कि अमलेन्दु उपाध्याय द्वारा
परिषद् को सूचित किये जाने के बाद भी उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं
की गई। हम परिषद् से मांग करते हैं कि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए
और पत्रकार धमकाने वाले दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की जाए।

द्वारा
विजय प्रताप, शाह आलम, राजीव यादव, शाहनवाज आलम, ऋषि कुमार सिंह, अवनीश
राय, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, शिवदास, देवाशीष प्रसून, दिलीप, प्रबु़द्ध
गौतम, अरुण उरांव,वरुण शैलेश, अरुण वर्मा, अर्चना मेहतो, सौम्या झा,
विवेक मिश्रा, प्रवीण मालवीय, पूर्णिमा उरांव, सीत मिश्रा, नवीन कुमार।


संपर्क – 9696685616, 9452800752,9873672153

रविवार, 17 अप्रैल 2011

यूपीसी सेवा बंद, डाक विभाग के निजीकरण की साजिश

मीडिया स्टडीज ग्रुप की अपील-
यूपीसी सेवा समाप्त करने के खिलाफ आवाज उठायें।

डाक विभाग द्वारा यू पी सी की सेवा समाप्त कर दिया गया है। यूपीसी एवरीभिएशन है। अंडर (यू) पोस्टिंग(पी) सर्टिफिकेट(सी)। यू पी सी में डाक विभाग का कुछ भी अतिरिक्त खर्च नहीं होता है बल्कि डाक विभाग को इससे लाभ होता है। उपभोक्ता साधारण डाक को उचित टिकट लगाने के बाद उसे लेटर बॉक्स में डालने के बजाय पोस्ट ऑफिस में दे देता है। उपभोक्ता इस लिफाफे के साथ एक सादे कागज पर तीन रूपये का टिकट लगा देता है और उस टिकट युक्त कागज पर पोस्ट ऑफिस उक्त पत्र की प्राप्ति के सबूत के तौर पर मात्र एक मुहर लगा देता है। उपभोक्ताओं को यह छूट होती है कि तीन रूपये के टिकट पर एक साथ तीन लिफाफे यू पी सी के तहत दे सकता है। नाम से स्पष्ट है कि पोस्ट किए गए लिफाफे का महज एक प्रमाण पत्र उपभोक्ता को मिल जाता है। जिस देश में 76 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 20 रूपये से कम पर गुजारा करती है वैसे समाज में इस तरह की सेवा की उपयोगिता का अंदाजा लगाया जा सकता है।लेकिन डाक विभाग ने यह सेवा समाप्त करके डाक विभाग में निजीकरण की प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश की है। डाक विभाग ने पहले से ही रजिस्टर्ड डाक काफी महंगा कर दिया है।रजिस्टर्ड डाक महंगा किए जाने के पीछे देश में कूरियर कंपनियों को बढ़ावा देने योजना रही है। यह डाक विभाग की सबसे पुरानी सेवाओं में एक है। इसका उपयोग इन दिनों वैसे लोगों ने भी बड़े पैमाने पर करना शुरू किया है जो सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल करते हैं। हमारा ये मानना है कि इस फैसले के जरिये सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल करने वाले कार्यकर्ताओं पर अंकुश लगाने की भी एक कोशिश की गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त करने के कई तरह के उपाय सत्ता करती रही है।इस तरह की सेवा को खत्म करना संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकार पर भी हमला है। हम यह मांग करते है कि सरकार को तत्काल यूपीसी की सेवा समाप्त करने के अपने फैसले को वापस लेना चाहिए। हम इस सेवा को समाप्त किए जाने के फैसले के खिलाफ एक अभियान चलाएं। सरकार यदि ये समझती है कि गरीबों के हितों वाली सेवाओं को समाप्त किया जाता है तो इस तरह के फैसलों के खिलाफ आवाज नहीं उठेगी। सिविल सोसायटी को इस तरह के मामूली मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं होगी जिस तरह से नमक ( दो रूपये किलो का नमक आज पन्द्रह रूपये से ज्यादा कीमत पर मिलता है और इस बढ़ी कीमत को कोई ठोस कारण समझना किसी के लिए भी मुश्किल है।) की कीमत के बढ़ने के पूरे मामले को समझा गया। लोकतंत्र में सरकार पर यह भरोसा रहता है कि वह जनहित का ध्यान रखेगी। यदि सरकार यह भरोसा तोड़ती है तो यह लोकतंत्र की अवधारणा को खंडित करने की कोशिश मानी जानी चाहिए। आप इस अभियान में साथ दें। डाक विभाग के मंत्रियों और अधिकारियों को ईमेल भेजे।पत्र लिखें।
मंत्रियों के नाम व संपर्क सूत्र इस प्रकार है।

Shri Kapil Sibal 24362333 ( Fax) ,24369191,24362626,23010468, 23795353 (Fax)
23017146 email: mocit@nic.in

2.Minister of State Shri Gurudas Kamat 23372248 23372247 6624 23092626, 23092627 (FAX) 23092626 email: gurudas.kamat@nic.in

3) Minister of State Shri Sachin Pilot 24360958 (fax) 24368757
24368758 24364332 24364333 ,23795060, 23795070, 23795080 ( There is no email address of leader of young mr. sachin pilot

4.Secretary (Posts) & Chairman PS Board ,Ms. Radhika Doraiswamy,email-secretary-posts@indiapost.gov.in

समाचार पत्रों में चिट्ठियां लिखे।फेसबुक और दूसरे सोशल नेटवर्किंग का भी उपयोग करें। जो पत्रकार है वे इसकी खबर लें और दें।सांसदों –विधायकों को भी जगाए।उन्हें सूचित करें कि यूपीसी सेवा समाप्त कर दी गई है। उनसे भी पत्र लिखवाए और बय़ान जारी करवाए। सूचना के अधिकार के तहत केन्द्रीय सरकार के डाक विभाग से यह जानकारी मांगे कि इस सेवा को समाप्त किए जाने की क्या वजह है।आप इस अभियान में दो से पांच मिनट का वक्त भी निकालें तो आपकी भूमिका से सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ेगा।

साथियों की ओर से,
अनिल चमड़िया

शनिवार, 4 सितंबर 2010

दास्तान-ए-हिंदू पत्रकारिता

अयोध्या मसले पर जनमाध्यमों में आ रही सांप्रदायिक खबरों को रोकने के लिए जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) और मीडिया स्टडीज सेंटर के अभियान के तहत हम फैजाबाद से निकलने वाले जनमोर्चा के पत्रकार रहे कृष्ण प्रताप सिंह के लेख को प्रसारित कर रहे हैं। यह लेख उन पत्रकार साथियों के लिए है, जो उस दौरान अयोध्या बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में मीडिया की भूमिका को नहीं समझ पा रहे हैं या फिर उस घटना के बाद पत्रकारिता की दुनिया में आए हैं।


कृष्ण प्रताप सिंह

यह एक संयोग (कायदे से दुर्योग) ही था कि उधर विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या को रण क्षेत्र में बदलने के लिए दाँत किटकिटा रहा था और इधर मेरे भीतर सोये नन्हें पत्रकार ने आँखें मलनी शुरू की । जिस फैजाबाद जिले में अयोध्या स्थित है,उसके पूर्वांचल के एक अत्यन्त पिछड़े हुए गाँव से बेहद गरीब बाप के दिये नैतिक व सामाजिक मूल्यों की गठरी सिर पर धरकर यह पत्रकार चला,तो उसका सामना विश्व हिन्दू परिषद द्वारा दाऊ दयाल खन्ना के नेतृत्त्व में सीतामढ़ी से निकाली जा रही रथयात्रा से हुआ ‘आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्म भूमि का ताला खोलो’ जैसे नारे लगाती आती यह यात्रा अन्ततः, आम लोगों द्वारा अनसुनी के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या से उफना उठे सहानुभूति के समन्दर में डूब गयी थी। और डूबती भी क्यों नहीं, श्रीमती गाँधी ने अपने प्रधानमंत्री रहते इसकी बाबत कोई टिप्पणी तक नहीं की। उन्हें मालूम था कि उनकी टिप्पणी से व्यर्थ ही इस यात्रा का भाव बढ़ जायेगा। संघ परिवार इससे अति की हद तक निराश हुआ।

फिर तो इस परिवार की राजनीतिक फ्रंट भाजपा भी ‘गाँधीवादी समाजवाद’ के घाट पर आत्महत्या करते-करते बची। लेकिन राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री काल में इन दोनों ने ‘नया जीवन’ प्राप्त करने के लिए नये स्वांगों की शरण ली,तो असुरक्षा के शिकार प्रधानमंत्री और उनके दून स्कूल के सलाहकार ऐसे आतंकित हो गये कि उनको इन्हें मात देने का सिर्फ एक तरीका दिखा। वह यह कि अपनी ओर से ताले खोलने का इंतजाम करके तथाकथित हिन्दू कार्ड छीनकर इन्हें ‘निशस्त्र’ कर दिया जाये। फिर क्या था, मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने इसके लिए अपनी सेवाएं प्रस्तुत कर दीं और इस बात को सिरे से भुला दिया गया कि यों ताले खुलना विवाद का अन्त नहीं, नये सिरे से उनका प्रारम्भ होगा। फिर तो उनमें से ऐसे-ऐसे जिन्न निकलने शुरू होंगे,जिन्हें किसी भी बोतल में बन्द करना सम्भव नहीं होगा.

विहिप और भाजपा को तो यों भी ताले खुलने से तुष्ट नहीं होना था. इसलिए इन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था. जैसे-जैसे राजीव गाँधी को मिले जनादेश की चमक फीकी पड़ती गयी और वे राजनीतिक चक्रव्यूहों में घिरते गये, ये रामजन्मभूमि पर भव्य मन्दिर के तथाकथित निर्माण के लिए अपनी कवायदें तेज करती गयीं. यहाँ रुककर ‘रामजन्मभूमि’ का अयोध्या-फैजाबाद में प्रचलित अर्थ जान लेना चाहिएः बाबरी नाम से जानी जानेवाली कई सौ साल पुरानी एक मस्जिद, जिसमें (पुलिस में दर्ज रिर्पाट के अनुसार) 22/23 दिसम्बर 1949 की रात फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधीश के के. नैयर और हिन्दू सम्प्रदायिकतावादियों की मिलीभगत से जबर्दस्ती मूर्तियाँ स्थापित कर दी गयी थीं और कह दिया गया था कि भगवान राम का प्राकट्य हो गया है. फिर यह तर्क भी दिया जाने लगा था कि ऐसा करना किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है क्योंकि यह मस्जिद एक वक्त मन्दिर को तोड़कर निर्मित की गयी और गुलामी की प्रतीक थी. बिना इस अर्थ को समझे पत्राकारों के वे विचलन दिखेंगे ही नहीं जो ऐसे तर्कशास्त्रियों की संगति ने उनमें पैदा किये. इस अर्थ की कसौटी पर तो उनमें विचलन ही विचलन दिखायी देते हैं.

किस्सा कोताह, 1986 में ताले खुले और 1989 में राजीव गाँधी ने फिर हिन्दूकार्ड छीनने की कोशिश में ‘वहीं’ यानी गुलामी की प्रतीक उसी मस्जिद की जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए शिलान्यास करा दिया. उनकी और मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की समझ यह बनी कि शिलान्यास से हिन्दू फिर खुश होकर कांग्रेस के खेमे में आ जायेंगे. फिर ‘निर्माण’ रोक देने से मुसलमान भी तुष्ट ही रहेंगे और कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू हो जायेंगे. तब शाहबानो और बोफोर्स मामलों में फसंत के बावजूद चुनाव वैतरणी पार होने में दिक्कत नहीं होगी. मगर हुआ इसका ठीक उलटा. विहिप भाजपा ने शिलान्यास को अपनी बढ़ती हुई ताकत से डरकर सरकार द्वारा मोर्चा छोड़ देने के रूम में देखा और हर्षातिरेक में नये-नये दाँव पेचों की झड़ी लगा दी. फिर तो लोकसभा चुनाव में राजीव गाँधी का अयोध्या आकर प्रचार शुरू करने व रामराज्य लाने का वादा भी कुछ काम नहीं आया. 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस फैजाबाद लोकसभा सीट भी नहीं जीत सकी. आगे चलकर विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह यादव और पी.वी. नरसिंहराव/ कल्याण सिंह के राज में 1990-92 में कैसे ‘अयोध्या खून से नहायी’, ‘सरयू का पानी लाल हुआ’ और बाबरी मस्जिद इतिहास में समायी, यह अभी ताजा-ताजा इतिहास है.

हिन्दू कार्ड की छीना झपटी वाले इस इतिहास को वर्तमान के रूप में झेलना और पत्रकारीय जीवन का अब तक का सबसे त्रासद अनुभव था. मोहभंग के कगार तक ले जाने वाला. हालांकि इसके लिए मेरी नासमझी ही ज्यादा जिम्मेदार थी जिसके झाँसे में आकर मैं मान बैठा था कि पत्रकार होना सचमुच वाच डाग आफ पीपुल होना है. सच को सच की तरह समझने, कहने और पेश करने का हिमायती होना, मोह लोभ राग-द्वेष और छल प्रपंच से दूर होना, देश व दुनिया की बेहतरी के लिए बेड रूम से लेकर बाथरूम तक में सचेत रहना और जीवन में नैतिक, व प्रगतिशील मूल्यों का आदती होना भी. मुझे तो यह सोचने मे भी असुविधा होती थी कि कोई पत्रकार लोगों को स्थितियों और घटनाओं की यथातथ्य जानकारी देने के बजाय किसी संकीर्ण साम्प्रदायिक या धार्मिक जमात के हित में उन्हें गढ़ने व उनके उपकरण के रूप में काम करने की हद तक जा सकता है. मुझे तो पत्रकारिता की दुनिया भली ही सिर्फ इसलिए लगती थी कि यहाँ रहकर मैं जीवन के तमाम विद्रूपों का सार्थक प्रतिवाद कर सकता था. पूछ सकता था कि दुनिया इतनी बेदिल है तो क्यों है, लाख कोशिशें करने पर भी सँवरती क्यों नहीं है और कौन लोग हैं जो उसकी टेढ़ी चाल को सीधी नहीं होने दे रहे हैं ?

इसलिए विहिप भाजपा की कवायदों में धार्मिक साम्प्रदायिक, व्यावसायिक और दूसरे न्यस्त स्वार्थों से पीड़ित पत्रकारों को लिप्त होते, उनके हिस्से का आधा-अधूरा और असत्य से भी ज्यादा खतरनाक ‘सच’ बोलते-लिखते पाता तो जैसे खुद से ही (उनसे पूछते का कोई अधिकार ही कहां था मेरे पास) पूछने लगता: भारत जैसे बहुलवादी देश में कुछ लोग धर्म का नाम लेकर युयुत्सु जमावड़े खड़े करने और लोकतंत्र में प्राप्त सहूलियतों का इस्तेमाल उसे ही ढहाने, बदनाम करने में करने लगे हों, न संविधान को बक्श रहे हों न ही उसके मूल्यों को, दुर्भावनाओं को भावनाएं और असहिष्णुता को जीवन मूल्य बनाकर पेश कर रहे हों, तो क्या पत्राकारों को उनके प्रति सारी सीमाएं तोड़कर सहिष्णु होना, उनकी पीठ ठोंकना, समर्थन व प्रोत्साहन करना चाहिए ? क्या ऐसा करना खुद पत्राकारों का दुर्भावना के खेल में शामिल होना नहीं है ?

दुख की बात है कि प्रतिरोध की शानदार परम्पराओं वाली हिन्दी पत्रकारिता के अनेक ‘वारिस अयोध्या में दुर्भावनाओं के खेल में लगातार शामिल रहे हैं ? सो भी बिना किसी अपराधबोध के उनकी ‘मुख्य धारा’ तो शुरुआती दिनों से ही इस आन्दोलन का अपने व्यावसायिक हितों के लिए इस्तेमाल करती और उसके हाथों खुद भी इस्तेमाल होती रही है. 1990-92 में तो इन दोनों की परस्पर निर्भरता इतनी बढ़ गयी थी कि लोग हिन्दी पत्रकारिता हिन्दू पत्रकारिता कहने लगे थे. भय, भ्रम, दहशत, अफवाहों और अविश्वासों के प्रसार में अपने ‘हिन्दू भाइयों’ को कदम से कदम मिलाकर चलने वाले हिन्दू पत्राकारिता के अलमबरदार चार अखबारों आज, अमर उजाला, दैनिक जागरण और स्वतंत्र भारत की तो भारतीय प्रेस परिषद ने इसके लिए कड़े शब्दों में निन्दा भी की। मगर उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। ऐसा नहीं है कि प्रतिरोध के स्वर थे ही नहीं ? मगर वे नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गये थे। एक वाकया याद आता है। 1990 में विश्वनाथ प्रताप मुलायम के राज में दो नवम्बर को अयोध्या खून से नहायी (जैसा कि हिन्दू पत्रकारिता ने लिखा) तो मैं फैजाबाद से ही प्रकाशित दैनिक जनमोर्चा के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत था। जिसके चैक, फैजाबाद स्थित कार्यालय में ही संवाद समितियों ने अपने कार्यालय बना रखे थे. एक संवाद समिति ने कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग होते ही मृतकों की संख्या बढ़ा चढ़ाकर देनी शुरू कर दी,तो दूसरी के मुख्यालय में ‘दौड़ में पिछड़ जाने’ की आशंका व्याप्त हो गयी. वहाँ से उसके संवाददता को फोन पर बुलाकर कैफियत तलब की गयी तो उसने चुटकी लेते हुए कहा ‘देखिए, फायरिंग में जितने कारसेवक मारे गये हैं, उनकी ठीक-ठीक संख्या मैंने लिख दी है. बाकी की को उस संवाद समिति ने कब और कैसे मार डाला, आप को भी पता है. लेकिन कहें तो इसका मैं फिर से पता लगाऊँ. वैसे मृतकों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं तो प्लीज, एक काम कीजिए. बन्दूकें वगैरह भिजवा दीजिए. कुछ और को मारकर मैं यह संख्या प्रतिद्वन्द्वी संवाद समिति से भी आगे कर दूँ. लेकिन कार सेवक पाँच भरें और मैं पन्द्रह लिख दूँ, यह मुझसे नहीं होने वाला’

दूसरी ओर से बिना कोई जवाब दिये फोन काट दिया गया. लेकिन आत्मसंयम का यह बाँध ज्यादा देर तक नहीं टिका. मारे गये कारसेवकों की संख्या को बढ़ा चढ़ाकर छापने की प्रतिद्वन्द्विता में पत्रकारों व अखबारों ने क्या-क्या गुल खिलाये, इसे आज प्रायः सभी जानते हैं. आम लोगों में परम्परा से विश्वास चला आता था कि अखबारों में आमतौर पर पन्द्रह मौतें हों तो पाँच ही छपती हैं. कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग ने इस भोले विश्वास को भी तोड़कर रख दिया. पत्रकार खुद मौतें पैदा करने में लग गये. सच्ची नहीं तो झूठी ही सही.

लखनऊ से प्रकाशित एक दैनिक ने तो, जो अब खुद को विश्व का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार बताता है, गजब ही कर दिया. दो नवम्बर को अपराह्न उसने अपने पाठकों के लिए जो स्पेशल सल्पिमेन्ट छापा उसमें मृत कारसेवकों की संख्या कई गुनी कर दी और लाउडस्पीकरों से सजे वाहनों में लादकर चिल्ला चिल्लाकर बेचा. मगर सुबह उसका जो संस्करण अयोध्या-फैजाबाद आया उसमें मृतक संख्या घटकर बत्तीस रह गयी थी. जानकार लोग मजाक में पूछते थे कि क्या शेष मृतक रात को जिन्दा हो गये ? बेचारे अखबार के पास यह तर्क भी नहीं था कि अयोध्या बहुत दूर थी और हड़बड़ी में उसे गलत सूचनाओं पर भरोसा कर लेना पड़ा. गोरखपुर से छप रहे एक मसाला व्यवसायी के दैनिक ने भी कुछ कम गजब नहीं ढाया. उपसम्पादकों ने पहले पेज की फिल्म बनवायी तो पहली हेडिंग में 150 कारसेवकों के मारे जाने की खबर थी. सम्पादक जी ने उसमें एक और शून्य बढ़वाकर 1500 करा दिया ताकि सबसे मसालेदार दिखें. वाराणसी के एक दैनिक से इन पंक्तियों के लेखक की बात हुई. पूछा गया सच बताइए, कितने मरे होंगे. मैंने बताया 30 अक्टूबर और दो नवम्बर दोनों दिनों के हड़बोंग में सोलह जानें गयी हैं और यह बहुत दुखदायी है. उधर से कहा गया छोड़िए भी. हम तो छाप रहे हैं सरयू लाल हो गयी खून से हजारों मरे. नहीं मरे तो हमारी बला से! मैं फोन करने वाले को यह समझाने में विफल रहा कि सरकार को ठीक से कटघरे में खड़ी करने के लिए फायरिंग में हुई जनहानि की वस्तुनिष्ठता व सच्ची खबरें ज्यादा जरूरी हैं अफवाहें नहीं.

मारे गये कारसेवकों की वास्तविक संख्या का पता करने का फर्ज तो जैसे पत्रकारों को याद ही नहीं रह गया था. कोई पूछे कितने मरे ? तो वे प्रतिप्रश्न करते थे हिन्दुओं की तरह जानना चाहते हैं कि मुसलमानों की या फिर और... जो लोग ‘हिन्दुओं की तरह’ जानना चाहते थे, उनके लिए पत्राकारों के पास ‘अतिरिक्त जानकारीयाँ भी थीं. ‘पुलिस ही गोलियाँ चलाती तो इतने कारसेवक थोड़े मरते! पुलिस तो अन्दर-अन्दर अपने साथ ही थी. वह तो पुलिस की वर्दी में मुन्नन खाँ के आदमियों ने फायरिंग की और जमकर की. फिर लाशों को ट्रकों में भरकर सरयू में बहा दिया। मुसलमान पुलिस अफसरों व जवानों ने इसमें उनका सहयोग किया.’ मुन्नन खाँ उन दिनों पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादियों के मुलायम गुट के उभरते हुए नेता थे और उनकी बंग छवि के नाते विहिप-भाजपा ने उनमें भी एक ‘मुस्लिम खलनायक’ ढूँढ़ निकाला था और हिन्दू पत्रकार इसमें जी-जान लगाकर सहयोग कर रहे थे. उनको इस सच्चाई से कोई मतलब नहीं था कि अयोध्या में उस दिन किसी मुस्लिम पुलिस अधिकारी की तैनाती ही नहीं थी. फिर वह मुन्नन खाँ के कथित आदमियों को सहयोग क्या करता ? लेकिन कहा जाता है न कि झूठ के पाँव नहीं होते,लेकिन पंख होते हैं. इसीलिए तो कारसेवा समिति के प्रवक्ता वामदेव कह रहे थे कि दो नवम्बर की फायरिंग में उनके बारह कारसेवक मारे गये है और अखबार... कैसा विडम्बना थी कि आन्दोलन का नेतृत्व करनेवाली संस्था अपनी जनहानि को ‘कम करके’ बता रही थी. अखबारों की ‘सच्चाई’ पर भरोसा करने पर यही निष्कर्ष तो निकलेगा. कोई चाहे तो यह निष्कर्ष भी निकाल ही सकता है कि ‘हिन्दू’ मानसिकता वाले जिस पुलिस प्रशासन ने प्रदेश सरकार द्वारा आरोपित यातायात प्रतिबन्धों को धता बताकर लाखों कारसेवकों को 30 अक्टूबर को शौर्य प्रदर्शन के लिए अयोध्या में ‘प्रगट’ हो जाने दिया था, उसी ने मौका मिलते ही उन्हें बेरहमी से भून डाला. पुलिस है न, उसने भून देने के लिए ही उन्हें वहाँ इकट्ठा होने दिया था. लेकिन तब भारत तिब्बत सीमा पुलिस का ‘वह’ अधिकारी सिर्फ इतनी-बात के लिए अखबारों के स्थानीय कार्यालयों का चक्कर क्यों काट रहा था,कि कहीं दो लाइन छप जाए कि उसकी कम्पनी गोली चलाने वालों में शामिल नहीं थी, जिससे वह ‘लांछित’ होने से बच सके. पता नहीं वह बचा या नहीं लेकिन ‘जो भी सच बोलेंगे मारे जायेंगे’ की इस स्थिति की सबसे ज्यादा कीमत एकमात्र दैनिक जनमोर्चा ने ही चुकायी. उसने मारे गये कारसवकों की वास्तविक संख्या छाप दी. तो उग्र कारसेवक इतने नाराज हुए कि सम्पादक और कार्यालय को निशाना बनाने के फेर में रहने लगे. इससे और तो और कई ‘हिन्दू’ पत्रकार भी खुश थे. वे कहते थे, ‘ये साले (जनमोर्चा वाले) पिट जाएं तो ठीक ही है. हम सबको झूठा सिद्ध करने में लगे हैं. मुश्किल है कि ये सब भी ससुरे हिन्दू ही हैं. वरना...और सारे प्रतिबन्धों को धता बताकर, यथास्थिति बनाये रखने के अदालती आदेश के विरुद्ध, कारसेवा करने लाखों कारसेवक उस दिन अचानक अयोध्या की धरती फोड़कर निकल आए तो इस ‘चमत्कार’ में भी हिन्दू पत्रकारों का कुछ कम चमत्कार नहीं था. पत्रकार के तौर पर मिले व्यक्तिगत और वाहन पासों को मनमाने तौर पर दुरुपयोग के लिए इन्होंने कारसेवकों को सौंप दिया. कड़ी चैकसी के बीच जब अशोक सिंघल का अयोध्या पहुँचना एक तरह से असम्भव हो गया तो दैनिक ‘स्वतंत्रा भारत’ (लखनऊ) के सम्पादक राजनाथ सिंह उन्हें ‘प्रेस’ लिखी अपनी कार में छिपाकर ले आये. उन दिनों पत्रकारों में ‘कारसेवक पत्रकारों’ की एक नयी श्रेणी ‘विकसित’ हो गयी थी जो कारसवेक पहले थी और पत्राकार बाद में. ‘जनसत्ता’ के सलाहकार सम्पादक प्रभाष जोशी तो बहुत दिनों तक अपने लखनऊ संवाददाता के लिए ‘जनसत्ता’ के ही अपने ‘कागदकारे’ में ‘कारसेवक पत्रकार’ शब्द इस्तेमाल करते और इसकी पुष्टि करते रहे. जैसे कारसेवक पत्राकार थे वैसे ही कारसेवक अफसर व कर्मचारी भी और ‘राम विरोधी’ पत्रकारों व नेताओं से निपटने को लेकर इनमें अभूत पूर्व तालमेल था. बहुत कम लोगों को मालूम है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रखी जाने की तिथि पर जो ‘प्राकट्योत्सव’ होता है, उसकी बुनियाद भी स्थानीय दैनिक ‘नये लोग’ के दो सम्पादकों राधेश्याम शुक्ल और दिनेश माहेश्वरी ने रखी थी. राधेश्याम शुक्ल अब हैदराबाद से प्रकाशित ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक के सम्पादक हैं. ज्ञातव्य है कि मन्दिर निर्माण के आन्दोलन की बुनियाद मोटे तौर पर यह हिन्दू पत्रकारों द्वारा प्रायोजित प्राकट्योत्सव ही बना था.

लेकिन यह समझना नादानी के सिवाय कुछ नहीं होगा कि कारसेवक पत्रकारों की जमात अचानक 90-92 में कहीं से आकर ठसक के साथ बैठ गयी और अपना ‘दायित्व’ निभाने लगी थी. कहते हैं कि 1977 में लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो उन्होंने अपने दैनिक कृपापात्रों को विभिन्न अखबारों में उपकृत करा दिया था, ताकि वक्त जरूरत वे काम आ सकें. बाबरी मस्जिद के पक्षकारों को तो हमेशा ही शिकायत रही है कि विहिप से दोस्ताना रवैया रखने वाले हिन्दी मीडिया ने भी उनको इन्साफ मिलने की राह रोक रखी है. वे कहते हैं: (1) इस मामले में हिन्दी मीडिया ने पीड़ित पक्ष से सहानुभूति की अपनी परम्परा 22/23 दिंसम्बर 1949 से ही छोड़ रखी है जब मस्जिद में जबरन मूर्तियाँ रखी गयीं. पीड़ित हम हैं और यह मीडिया पीड़कों के साथ है. (2) 1984 में विहिप ने सरकार पर मस्जिद के ताले खोलने का दबाव बढ़ाने के लिए रथयात्रा शुरू की तो इस मीडिया ने उसे किसी जनाधिकार के लिए ‘जेनुइन’ यात्रा जैसा दर्जा दिया. हर चंन्द कोशिश की कि लोगों में यह बात न जाए कि यह एक द्विपक्षी मामले को जो अदालत में विचारधीन है, और गैर वाजिब तरीके से प्रभावित करने की कोशिश है. (3) एक फरवरी 1986 को ताले खोले गये तो भी इस मीडिया ने यह कहकर भ्रम फैलाया कि राम जन्मभूमि में लगे ताले खोल दिये गये. ताले तो विवादित मस्जिद में लगाये गये थे. जिसको मीडिया बाद में शरारत ‘विवादित रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद’ कहने लगा और अब सीधे ‘जन्मभूमि’ ही कहता है. (4) ताले खोलने के पीछे की साजिश कभी भी इस मीडिया की दिलचस्पी का विषय नहीं रही. ताले दूसरे पक्ष को सुने बिना हाईकोर्ट के आदेश की अवज्ञा करके खोले गये, मगर यह तथ्य मीडिया ने या तो बताया नहीं या अनुकूलित करके बताया. (5) भूमि के एक टुकड़े पर स्वामित्व के एक छोटे से मामले को विहिप ने धार्मिक आस्था के टकराव का मामला बनाना शुरू किया तो भी इस मीडिया ने तनिक भी चिन्तित होने की जरूरत नहीं समझी. (6) 1989 में विवादित भूमि पर राममन्दिर के शिलान्यास और 1990 में कारसेवा का आन्दोलन विहिप भाजपा से ज्यादा इस मीडिया ने ही चलाया. इससे पहले विहिप की ‘जनशक्ति’ का हाल यह था कि लोग उसके आयोजनों को कान ही नहीं देते थे और उसे अयोध्या में लगनेवाले मेलों की भीड़ का इस्तेमाल करना पड़ता था. (7) 1990 में इस मीडिया ने लोगों में खूब गुस्सा भड़काया कि मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या के परिक्रमा और कार्तिक पूर्णिमा के मेलों पर रोक लगा दी. मगर विहिप यों बरी कर दिया कि पूछा तक नहीं कि क्यों उसने अपने संविधान व कानून विरोधी दुस्साहस के लिए इन मेलों का वक्त ही बारम्बार चुना? (8) मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के इस बयान का भी मीडिया ने जानबूझकर लोगों को भड़काने के लिए अनर्थकारी प्रचार किया कि वे अदालती आदेश की अवज्ञा करके ‘बाबरी मस्जिद में परिन्दे को पर भी नहीं मारने देंगे.’ जब 30 अक्टूबर 90 को कारसेवक मस्जिद के गुम्बदों पर चढ़कर भगवा झंडा फहराने में सफल हो गये तो एक कार सेवक सम्पादक, (राजनाथ सिंह, स्वतंत्र भारत) आह्लादित होकर बोले ‘परिन्दा पर मार गया. परिन्दा पर मार गया.’ (9) कई अखबारों ने जानबूझकर नवम्बर की फायरिंग में मृतकों की संख्या बढ़ाकर छापने में एक दूजे से प्रतिद्वन्द्विता बरती. बाद में गलत सिद्ध हुए तो मृतकों के फर्जी नाम पते भी छाप डाले. ऐसे लोगों को भी फायरिंग में मरा हुआ बता दिया जो कभी अयोध्या गये नहीं और अभी भी जिन्दा हैं. इनके लिए विहिप की प्रेस विज्ञप्तियाँ ही खबरें होती हैं जिसके बदले में ये भाजपा द्वारा उपकृत होने की आशा रखते हैं. ऐसे कोई उपकृत चेहरे राज्यसभा में भी दिखते हैं. (10) 1992 में जब कल्याण सिंह सरकार ने विहिप और कारसेवकों को पूरी तरह अभय कर दिया कि उनके खिलाफ गोली नहीं चलायी जायेगी तो उन्होंने सिर्फ बाबरी मस्जिद का ही ध्वंस नहीं किया. उन्होंने 23 अविवादित मस्जिदों को नुकसान पहुँचाया, कब्रें तोड़ीं और मुस्लमानों के 267 घर व दुकानें जला दीं. इतना ही नहीं, उन्होंने सत्रह लोगों की जानें भी ले लीं. कजियाना मुहल्ले में एक बीमार मुस्लिम स्त्री को उन्होंने उसकी रजाई समेत बाँधकर जला दिया और उसके उस विश्वास की भी रक्षा नहीं की,जो उसने उनमें जताया था. जब अन्य मुस्लमान अयोध्या से भाग रहे थे,तो उसने जाने से मना कर दिया और कहा था कि भला वे मुझको मारने क्यों आयेंगे. तब कहर ऐसा बरपा हुआ था कि कोई छः हजार मुस्लमानों में से साढ़े चार हजार अयोध्या छोड़कर भाग गये थे. अपवादों को छोड़कर किसी भी हिन्दी अखबार को कारसेवकों के ये कुकृत्य नहीं दिखे . इनके लिए आज तक किसी को भी कोई सजा नहीं मिली क्योंकि सरकार ने मुकदमा चलाने की ही जरूरत नहीं समझी. आज की तारीख में कोई हिन्दी पत्राकार या अखबार इसे अपनी चिन्ताओं में शामिल नहीं करता. (11) हिन्दी मीडिया इस मामले में मुस्लिमों को खलनायक बनाने का एक भी मौका नहीं चूकता और इस तथ्य को कभी रेखांकित नहीं करता कि इस विवाद के शुरू होने से लेकर अब तक मुस्लिम पक्ष की ओ से गैर कानूनी उपचार की एक भी कोशिश नहीं की गयी है.

कई लोगों को उम्मीद थी कि छः दिसम्बर 1992 को कारसेवकों के हाथों अपने कैमरे और हाथ पैर तुड़वा लेने के बाद ये पत्रकार खुद को थोड़ा बहुत अपराधी महसूस करेंगे और आगे की रिपोर्टिंग में थोड़ा वस्तुनिष्ठ रवैया अपनायेंगे. मगर अटल बिहारी वाजपेयी के राज में मार्च, 2002 में हुए विहिप के शिलादान कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ने इस उम्मीद को भी तोड़ दिया. विहिप भले ही इस कार्यक्रम में 90-92 जैसी स्थितियाँ नहीं दोहरा सकी मगर मीडिया में 90-92 जैसी स्थिति पैदा ही हो गयी गयी. प्रामाणिक खबरें देने के बजाय यह मीडिया फिर विहिप का काम आसान बनाने वाली कहानियाँ गढ़ने और प्रचारित प्रसारित करने में एक दूजे से आगे बढ़ने के प्रयत्नों में लग गया. पत्रकारीय मानदंडों को पहले जैसा ही रोंदते हुए. इस बार कारसेवक ‘रामसेवकों’ में बदल गये थे. वे आने लगे तो रेलों में डिब्बों पर अनधिकृत रूप से कब्जा कर यात्रियों को साम्प्रदायिक आधार पर तंग करने उनसे जबरिया जय श्रीराम के नारे लगवाने और लगाने की स्थिति में मारपीटकर ट्रेन से नीचे फेंक देने जैसी घटनाएं (जिनमें मौते भी हुईं) रुटीन हो गयीं. उन्होंने जगह-जगह महिलाओं से बदलसलूकी भी की. लेकिन आम यात्रियों के तौर पर ये घटनाएं खबरों का हिस्सा नहीं बनीं. जिस साबरमती ट्रेन के दो कोच गोधरा में जल गये और उनमें सवार रामसेवकों की जानें गयी. वह फैजाबाद जिले के रुदौली रेलवे स्टेशन से ही रामसेवकों की उद्दन्डता और उत्पात की गवाह बनी थी. लेकिन गोधरा को ‘मुस्लिम प्रतिक्रिया’ बता देने में पल भर भी न लगाने वाले मीडिया न उनके उत्पातों पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज रखा. दैनिक जनमोर्चा को छोड़ कहीं भी इनकी खबरें नहीं छपीं. इससे गुजरात में हिन्दू प्रतिक्रिया’ के सरदारों को कितनी सुविधा हुई, कौन नहीं जानता? वे न्यूटन तक को बीच में ले आए और खूँरेजी का औचित्य सिद्ध करने लगे.

सरकार ने रेलें बसें रोककर और जाँच पड़ताल का शिंकजा कसकर रामसेवकों के आने की गति धीमी कर दी तो भी अखबार और चैनल भी अब तो चैनल भी मैदान में थे, ‘टकराव बढ़ने के आसार और ‘रामसेवकों का आना जारी’ जैसे शीर्षक ही देते रहे. विडम्बना यह कि वे सूने रामसेवक या कारसेवकपुरम की तस्वीरें छापते थे, वहाँ खौफनाक सन्नाटे की बात करते थे लेकिन उन हजारों कारसेवकों का उनके पास एक भी चित्र नहीं होता था जिनका आना वे जोर-शोर से बता रहे थे. यह बेईमानी’ इसलिए थी ताकि कम से कम इतनी भी भीड़ तो जुट ही जाए कि विहिप अपनी ‘जनशक्ति’ जता सके. एक दैनिक ने तो लिखा भी ‘विहिप की जनशक्ति को लेकर किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए.’

दूसरी ओर अयोध्या, फैजाबाद के नागरिक क्रफ्यू से भी बुरी हालात में विहिप के रामसेवकों और सरकारी सेवकों के पाटों के बीच पिस रहे थे, मगर उनके लिए मीडिया के पास समय नहीं था. कुछ पत्रकार नागरिकों की प्रतिबन्धों से आजादी के पक्ष में थे भी तो इस चालाकी में कि इसकी आड़ में रामसेवककों की घुसपैठ हो सके. हैरत की बात थी कि 2002 में भी पत्रकार विहिप को हिन्दुओं के ‘विधिमान्य’ वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में ही प्रचारित कर रहे थे. उन्हें यह बताना गवारा नहीं था कि विहिप का समझौते कर लेने और मुकरकर समस्याएं खड़ी करने का इतिहास रहा है. कई पत्रकार विहिप के जटाजूटधारियों और साधुवेशियों को अनिवार्य रूप से सन्त बनाये हुए थे. लेकिन इन सन्तों की इस असलियत से उन्हें कोई मतलब नहीं था कि उनमें से कई बेपेंदी के लोटे हैं. उनकी बातें गाड़ी के पहिये की तरह चलती रहती हैं और आज कहकर कल मुकर जाने और कुछ और कहने लग जाने में वे अपना सानी नहीं रखते. ‘शिला दानी’ रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष रामचन्द दास पर महंत ने एलान किया हुआ था कि पन्द्रह मार्च को वे लाठी गोली की परवाह न करते हुए विहिप की कार्यशाला से तराशे गये पत्थर लेकर अधिग्रहीत परिसर जायेंगे. बाद में उन्होंने कह दिया कि वे वहाँ जायेंगे ही नहीं. एक बार एक पत्राकार ने उनसे पूछा कि आखिर उन्होंने रुष्ट होकर जान देने की घोषणा क्यों की. उनका जवाब था ऐसा न करता तो क्या तुम लोग मुझे घेरकर बैठते? किसी भी पत्राकार ने उनकी इस ‘प्रचार प्रियता’ का नोटिस नहीं लिया. विहिप के नेता इस पल अदालत का फैसला मानते थे और उस पल मानने से इनकार कर देते थे मगर कहीं भी पत्राकार इसके प्रति आलोचनात्मक नहीं थे.

2002
में विश्व हिन्दू परिषद के तमाशों से आजिज अयोध्यावासियों में गुस्सा भड़का हुआ था और वे उसे छिपा भी नहीं रहे थे,पर मीडिया ने इसे भरपूर छिपाया. नागरिकों के स्वतःस्फूर्त और अराजनीतिक शांतिमार्च की खबर देने के लिए भी उसके पास शब्द नहीं थे. उसने फिर खुद को विहिप के साथ नत्थी कर लिया था हालांकि विहिप अपने शुभचिन्तक मीडिया के प्रति अभी भी सहिष्णु नहीं थी. एसोसिएटेड प्रेस के एक संवाददाता को तो विहिपवालों ने पीटा भी. फिर भी साम्प्रदायिक कारणों से विहिप के साथ नत्थी पत्राकार ऐसी खबरें गढ़ते रहे जिनसे अपने अयोध्या में बने रहने का औचित्य सिद्ध कर सकें. ऐसा ही उन्होंने 1990-92 में भी किया था.

इस सिलसिले में उनकी भाषा पर गौर किये बिना बात अधूरी रहेगी. विश्वहिन्दू परिषद देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेशों की अवज्ञा और ‘हर हाल में मनमानी’ पर अड़ी हुई थी तो इसे उसका ‘अडिग रहना’ कहकर ग्लैमराइज किया जाता था. जैसे उसकी जिद किसी प्रशंसनीय उद्देश्य से जुड़ी हुई हो और उसके पूरी हो जाने से इस देश के लोगों में कम से कम हिन्दुओं की तमाम चिन्ताओं का एकमुश्त समाधान हो जाने वाला हो. विहिप अपनी बात से मुकर जाती तो मीडिया इसे उसका रणनीति बदलना कहता और विहिप के विरोधी यानी (रामविरोधी) अपनी बात की दोहराते तो कहा जाता वे अपनी हठधर्मी पर कायम हैं. मुलायम सिंह यादव के पिछले मुख्यमंत्रित्व काल में जब विहिप ने उनसे ‘मिलकर’ अयोध्या कूच का नारा दिया तो भी मीडिया अपने पुराने रंग में ही दिखा. अभी हाल में अलकायदा की ओर से अयोध्या के सन्तों को धमकी भरे पत्रों के कथित मामले को साम्प्रदायिक रंग देने में जुटे हिन्दू पत्राकारों को तब साँप सूँघ गया जब पता चला कि पत्र तो महन्त नृत्य गोपाल दास के एक नाराज शिष्य का खेल था.

यह ‘परम्परा’ अभी भी अटूट है. इसीलिए कहा जाता है कि अयोध्या फैजाबाद में विहिप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार उसकी समर्थक है अथवा विरोधी क्योंकि प्रशासन और पत्राकार प्रायः उसी के हाथ में खेलते रहते हैं. प्रतिगामिता की हद यह कि ऐसे में वे तनिक भी तार्किक नहीं होते. विहिप द्वारा प्रायोजित फासीवाद भी, कहीं आया हो या नहीं, और चाहे ‘फैसला कुछ भी हो मन्दिर तो वहीं बनना चाहिए’ कहने वालों पर भी कम व्यापा हो, इन पत्राकारों पर तो इस तरह नशा बनकर छाया है कि उतर ही नहीं रहा. उतर जाता तो वे समझ जाते कि साम्प्रदायिकता तो किसी भी समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक तनावों का बाई प्रोडक्ट होती है और उसका कोई भविष्य नहीं होता. तब वे खुद (साम्प्रदायिक) हिन्दू होने के लिए प्रगतिशीलता और प्रतिरोध की गौरवशाली विरासत की धनी हिन्दी पत्राकारिता को शर्मसार करने पर न उतरे रहते. मरने वाले का धर्म पूछकर खुश या नाखुश नहीं होते. तब झूठ और फरेब मिलकर भी किसी अखबार में यह ‘खबर’ नहीं छपवा पाते कि 90 में कारसेवकों के ‘दमन’ करनेवाले एक पुलिस अधिकारी की ईश्वर के कोप से आँख ही बह गयी. तब दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला राम मन्दिर निर्माण का घोटाला इतना अचर्चित नहीं रहता. कोई न कोई शिलापूजन के दौरान देश-विदेश से प्राप्त हुई रत्नजटिता शिलाओं का अता-पता भी पूछता ही. मगर आज तो कोई उस ‘हुतात्माकोष’ के बारे में भी कोई सवाल नहीं उठया जाता,जिसे विहिप ने फायरिंग में मारे गये कारसेवकों के परिजनों की मदद के लिए बनाया था. और जिसमें आयी धनराशि का ब्यौरा आज तक किसी को ज्ञात नहीं है. उससे किस कारसेवक के किस परिजन को कितनी मदद दी गयी. यह भी कोई नहीं जानता.

निष्कर्ष साफ है: हिन्दी पत्रकारिता इस तरह हिन्दू पत्रकारिता में ढलकर हिन्दी की लाज तो गँवायेगी ही गँवायेगी हिन्दुत्व की लाज भी नहीं बचा पायेगी. झुनझुना बनकर रह जायेगी, बस और लोग उस पर एतबार करना छोड़ देंगे. तब ‘हिन्दुत्व’ के अलमबरदारों के लिए भी ‘हिन्दू पत्रकारों’ का कोई इस्तेमाल नहीं रह जायेगा.